
नई दिल्ली, 30 मार्च (हि.स.)। केन्द्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल शिवसेना ने कांग्रेस पर देश में नक्सलवाद को फैलने देने का आरोप लगाते हुए आज कहा कि वामपंथ के राजनीतिक समर्थन की मजबूरी में कांग्रेस ने आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा से दूर रख कर उन पर अत्याचारों की अनदेखी की जिससे वाम हिंसा के लाल गलियारे को पनपने का मौका मिला। उधर, विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि देश-दुनिया में दक्षिणपंथी हिंसा बढ़ रही है और सरकार संसद में वामपंथी हिंसा पर चर्चा करा रही है।
लोकसभा में सोमवार को नियम 193 के तहत नक्सलवाद मुक्त भारत विषय पर हुई अल्पकालीन चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। चर्चा की शुरुआत करते हुए शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे देश में नक्सलवाद को फैलने का जिम्मेदार कांग्रेस को बताते हुए कहा कि नक्सलवाद पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ था, अगर कांग्रेस सरकार ने समय पर समुचित कदम उठाए होते तो यह 12 राज्यों और 200 जिले नहीं पहुंच पाता। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार मजबूत नहीं बल्कि मजबूर थी। वामपंथी विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन उनकी मजबूरी थी और इसी कारण देश में नक्सलवाद बढ़ा।
शिवसेना सांसद शिंदे ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह ने एक साल पहले सदन में कहा था कि 31 मार्च तक देश से नक्सलवाद खत्म करने का प्रयास किया जाएगा और आज 30 मार्च को इस विषय पर चर्चा हो रही है। यह सरकार की हिम्मत है कि समय सीमा तय कर उसके पहले ही सदन में इस मुद्दे पर चर्चा की जा रही है। जो लोग नक्सलवाद को खत्म करना असंभव बताते थे, उन्हें करारा जवाब मिला है।
उन्होंने कहा कि 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ आंदोलन चार दशकों में 12 राज्यों और 200 जिलों तक फैल गया। कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों और पिछड़ों के लिए समय पर सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराईं, जिसके कारण उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर होना पड़ा। शिंदे ने कहा कि उस समय आदिवासियों पर अत्याचार होता था और उन्हें नक्सलवाद की आग में झोंका जाता था, लेकिन आज एक आदिवासी महिला देश की राष्ट्रपति है। यह फर्क कांग्रेस और भाजपा सरकारों के कार्यकाल का है।
शिंदे ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार मजबूत नहीं बल्कि मजबूर थी। वामपंथी दलों के साथ गठबंधन उनकी मजबूरी थी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी उनकी मजबूरी थी और नीतिगत लकवा उनकी मजबूरी थी। मोदी सरकार ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति से रेड कॉरीडोर (लाल गलियारे) को खत्म कर देश को विकास गलियारा दिया है। औद्योगिक गलियारा, माल गलियारा, आर्थिक गलियारा और रक्षा गलियारा आज देश को नया रास्ता दिखा रहे हैं।
शिंदे ने कहा कि पिछले 11 सालों में भाजपा सरकार ने कांग्रेस के पैदा किए हर बीमारी का इलाज किया है। उन्होंने गढ़चिरौली में 5 हजार युवाओं को मुख्यधारा में लाने का जिक्र किया । उन्होंने कहा कि दस हजार से अधिक नक्सलियों ने हथियार डालकर मुख्यधारा को चुना। अकेले 2025 में 317 नक्सली मारे गए, 862 गिरफ्तार हुए और 10,900 ने आत्मसमर्पण किया। 2024 और 2025 में 28 बड़े नक्सली नेता मारे गए जिनमें केंद्रीय समिति के छह सदस्य शामिल थे। 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 630 से अधिक कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया।
शिंदे ने कहा कि महाराष्ट्र में साल 2004 से 2019 के बीच राज्य में 1500 नक्सली हमले हुए जिनमें 536 लोगों की जान गई। लेकिन आज गढ़चिरौली स्टील केंद्र बनने जा रहा है। उन्होंने 20 हजार करोड़, 10 हजार करोड़ और एक लाख करोड़ के प्रोजेक्ट, हवाई अड्डा, रेलवे और कौशल केंद्रों को राज्य के विकास का नया केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में देश से माओवाद, जातिवाद, आतंकवाद और अलगाववाद खत्म होगा और केवल राष्ट्रवाद ही रहेगा।
वहीं, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद महुआ मोइत्रा ने इस चर्चा को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि जब भारत समेत दुनिया दक्षिणपंथी आतंक के तहत झुलस रही है और पश्चिम एशिया का संकट गहराता जा रहा है, तब सरकार वामपंथी उग्रवाद पर चर्चा कर रही है। ऐसे समय में हम यहां नक्सलवाद पर चर्चा कर रहे हैं। यह चर्चा सरकार और खासकर गृह मंत्री के लिए खुद की पीठ थपथपाने का बहाना है।
महुआ मोइत्रा ने कहा कि नक्सलवाद की शुरुआत साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह से हुई थी। यह आंदोलन चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल के नेतृत्व में चला। साल 2004 में पीपुल्स वॉर और माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र का विलय होकर सीपीआई माओवादी पार्टी बनी। यह समस्या केवल कानून व्यवस्था की नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक है। आदिवासियों की जमीन का शोषण, उनका विस्थापन, प्राकृतिक संसाधनों की लूट और पिछड़े इलाकों की उपेक्षा इसकी जड़ें हैं।
उन्होंने कहा कि 2019 से 2025 के बीच हत्याओं में 131 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि गिरफ्तारियों में 26 प्रतिशत की कमी आई है। पश्चिम बंगाल में पिछले तीन वर्षों में कोई मौत नहीं हुई है। उन्होंने बस्तर के सैन्यीकरण, फर्जी मुठभेड़ों, सीआरपीएफ में आत्महत्याओं और इस्तीफों, एकलव्य विद्यालयों की खराब स्थिति और आदिवासी अधिकारों के हनन के आरोप लगाये और कहा कि नक्सलवाद का खतरा पूरी तरह खत्म करने के लिए लोगों का विश्वास जीतना होगा, केवल इलाका जीतने से काम नहीं चलेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर