ओंकारेश्वर में एकात्म पर्व के दूसरे दिन दिखा अध्यात्म, पर्यावरण और संस्कृति का अनूठा समागम

18 Apr 2026 22:39:53
ओंकारेश्वर में एकात्म पर्व


भोपाल, 18 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी पुण्य सलिला मां नर्मदा के पावन तट ओंकारेश्वर में आयोजित 'एकात्म पर्व' के दूसरे दिन शनिवार को अध्यात्म, पर्यावरण और संस्कृति का एक अनूठा समागम देखने को मिला।

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा आयोजित इस महोत्सव में देश के प्रख्यात संतों और विचारकों ने आदि गुरु शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन की वैश्विक प्रासंगिकता पर गहन विमर्श किया। जहां गुरुवाणी और वेदांत के साझा सूत्रों को तलाशा गया, वहीं प्रकृति को स्वयं का ही विस्तार मानकर उसके संरक्षण का संकल्प दोहराया गया। शाम ढलते ही ओड़िसी और भरतनाट्यम की शास्त्रीय मुद्राओं ने शंकर के कालजयी स्तोत्रों को मंच पर जीवंत कर दर्शकों को एकात्म भाव के आनंदमय रस में सराबोर कर दिया।

एक ओंकार की अनुगूंज सर्वप्रथम इसी ओंकारेश्वर की पुण्य भूमि से हुई : महंत दर्शन सिंह

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा 17 से 21 अप्रैल तक चल रहे पंच दिवसीय एकात्म पर्व के दूसरे दिन सिख संप्रदाय पर विशेष सत्र हुआ, जिसमें गुरु ग्रन्थ साहिब से लेकर अद्वैत दर्शन की चर्चा हुई। इस सत्र में निर्मल अखाड़ा के महंत दर्शन सिंह ने कहा कि गुरुनानक देव गुरुवाणी का मंगलाचरण अद्वैत से ही करते है। एक ओंकार की अनुगूंज सर्वप्रथम इसी ओंकारेश्वर की पुण्य भूमि से हुई है। उन्होंने कहा कि सभी शास्त्रों के पीछे की मूल शक्ति है एक ओंकार ही है। उन्होंने कहा कि गुरुवाणी में ब्रह्म के अनेक उदाहरण है, ब्रह्म ही इस संसार का आधार है।

रामकृष्ण मिशन पर आधारित सत्र में स्वामी जापसिद्धानंद, स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी तथा स्वामी सर्वभद्रानंद ने सहभागिता की। इस सत्र में वक्ताओं ने रामकृष्ण परमहंस के जीवन, उनके अद्वैत दर्शन तथा मिशन की व्यापक भूमिका पर गहन विचार प्रस्तुत किए। स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी के अनुसार, रामकृष्ण मिशन को केवल एक संस्था के चश्मे से देखना इसकी व्यापकता को सीमित करना होगा। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि रामकृष्ण मिशन वास्तव में “श्री रामकृष्ण और उनके मिशन” का एक जीवंत विस्तार है। उन्होंने अपने विचारों को चार मुख्य स्तंभों, रामकृष्ण परमहंस का जीवन दर्शन, उनके शिष्यों का योगदान, संस्थागत ढांचा और समाज पर प्रभाव, में विभाजित कर प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘शिव ज्ञाने जीव सेवा’ के मंत्र को समझाते हुए कहा कि सेवा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव में शिव का दर्शन करना है।

स्वामी सर्वभद्रानंद ने बताया कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सन् 1897 में अपने शिष्यों के साथ मिलकर रामकृष्ण आश्रम की स्थापना की। उन्होंने यह भी कहा कि परमहंस जैसे संत विरले होते हैं, जो यह कह सकें कि वे ईश्वर के साक्षात दर्शन करा सकते हैं। स्वामी जापसिद्धानंद ने अद्वैत की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए तोतापुरी बाबा के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार तोतापुरी बाबा ने रामकृष्ण परमहंस को निर्विकल्पता की ओर अग्रसर किया। मां काली के साकार रूप के कारण ध्यान में आने वाली बाधाओं के बावजूद, अंततः उन्होंने निर्विकल्प समाधि का अनुभव प्राप्त किया। स्वामी जी ने मां शारदा देवी की पवित्रता का भी उल्लेख किया और बताया कि वे रामकृष्ण परमहंस की प्रथम शिष्या थीं, जिनकी पवित्रता के कारण वे लंबे समय तक समाधि में स्थित रह सके।

पर्यावरण हमसे अलग नहीं अपितु यह हमारा ही एक हिस्सा है : डॉ. बालकृष्ण पिसुपति

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, नई दिल्ली के राष्ट्र प्रमुख डॉ. बालकृष्ण पिसुपति ने अपने वक्तव्य में अद्वैत के श्लोक 'ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या' का उदाहरण लेते हुए बताया कि पर्यावरण हमसे अलग नहीं है, अपितु यह हमारा ही एक हिस्सा है, इसलिए किसी भी चीज को अलग समझना भ्रम है। उन्होंने कहा कि प्रकृति को बाहरी मानने के कारण ही संकटों की शुरुआत होती है।

डॉ. बालकृष्ण ने कहा कि पानी और जीव-जगत किसी सीमा को नहीं मानते, लेकिन मनुष्य ने सदैव उन्हें बाँटने की कोशिश की है। यही सोच पर्यावरण समस्याओं को जन्म देती है। उन्होंने कहा कि हम पर्यावरण संसाधनों के मालिक नहीं हैं, बल्कि उसके संरक्षक हैं। उन्होंने बताया कि कैसे सुविधाप्रधान जीवनशैली के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है। डॉ बालकृष्ण ने यह भी बताया कि हमें 10,000 साल पुरानी जीवनशैली जीने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने पर्यावरण के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। उन्होंने सलाह देते हुए कहा कि बदलाव की शुरुआत हमें खुद से करनी चाहिए। उसका प्रभाव भले ही कम लगे, परंतु उसका सामूहिक प्रभाव एक बड़ा अंतर ला सकता है। उनसे पूछे गए एक सवाल के उत्तर में उन्होंने स्पष्ट किया कि इस वक्त विश्व के सामने समस्या ये है कि हमारे पास एक समस्या के कई समाधान है और उनमें से किसी एक को चुनना मुश्किल है, क्योंकि हर देश विकास का अपना तरीका चुनता है।

सौर गांधी के नाम से प्रसिद्ध चेतन सिंह सोलंकी ने अद्वैत एवं पर्यावरण विषय पर बोलते हुए कहा कि विज्ञान प्रगति कर रहा है परंतु पृथ्वी का आकार, संसाधन नहीं बढ़ रहा है और मनुष्य निरंतर मिट्टी, जल , हवा दूषित कर रहा है। चेतन ने सत्र के दौरान अद्वैत कैसे पर्यावरण की रक्षा कर रहा है, सब में ब्रह्म है तो पर्यावरण दूषित क्यों हो रहा है? यूएन (संयुक्त राष्ट्र) के नियमों को किस तरह से अद्वैत से जोड़ सकते है जिससे सब के लिए समान नियम बने जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न वक्ताओं से पूछे और साथ ही उन्होंने कहा कि हम कुछ न करके भी पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते है। उन्होंने कहा हमारी जरूरतें बढ़ रही है परन्तु पृथ्वी सीमित है इसलिए हमारी जरूरतें सीमित होनी चाहिए।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से जीवंत हुआ आचार्य शंकर का दर्शन

पुण्य सलिला नर्मदा के तट पर आयोजित 'एकात्म पर्व' में आध्यात्मिक चेतना और कला का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वे सांस्कृतिक प्रस्तुतियां रहीं, जिन्होंने आदि गुरु शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन और उनकी कालजयी रचनाओं को मंच पर जीवंत कर दिया।

प्रकृति और स्तोत्रों का अनूठा संगम

आचार्य शंकर ने प्रकृति को ईश्वर का स्वरूप माना था। उन्होंने नदियों की दिव्यता को रेखांकित करते हुए गंगा, यमुना और नर्मदा पर कई स्तोत्रों की रचना की। कार्यक्रम में यह तथ्य प्रमुखता से उभरा कि हजारों वर्ष पूर्व, मात्र आठ वर्ष की अल्पायु में आचार्य शंकर ने ओंकारेश्वर की इसी पावन भूमि पर 'नर्मदाष्टकम्' की रचना की थी। आज भी त्वदीय पाद पंकजम्, नमामि देवी नर्मदे के स्वर करोड़ों लोगों के कंठ में गूँजते हैं। इसी तरह, जब वे गंगा के तट पर पहुंचे, तो उन्होंने देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे के माध्यम से गंगा की अलौकिकता का गान किया। ये स्तोत्र आज के समय में भी पर्यावरण संरक्षण और आध्यात्मिक शांति के लिए हम सभी के लिए प्रेरणा पुंज बने हुए हैं।

मंच पर उतरीं शास्त्रीय कलाएं

सांस्कृतिक संध्या में भारत की समृद्ध शास्त्रीय नृत्य परंपरा के माध्यम से शंकर के दर्शन को प्रस्तुत किया गया। प्रसिद्ध नृत्यांगना शुभदा वराड़कर ने अपने समूह के साथ ओड़िसी शैली में आचार्य शंकर द्वारा रचित स्तोत्रों पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। उन्होंने नृत्य के माध्यम से नदियों की चंचलता और उनके प्रति भक्ति भाव को बखूबी दर्शाया। सुप्रसिद्ध कलाकार पद्मजा सुरेश ने शक्ति पर केंद्रित भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी। उनकी मुद्राओं और पदचाप में आदि शक्ति का तेज और आचार्य शंकर की 'सौंदर्य लहरी' की झलक दिखाई दी।

कार्यक्रम में केवल नदियों पर केंद्रित स्तोत्र ही नहीं, बल्कि आचार्य शंकर की अन्य महान रचनाओं जैसे 'निर्वाणषटकम्' और 'गणेश पंचरत्नम्' पर भी कोरियोग्राफी प्रस्तुत की गई। मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं... के स्वर जब वातावरण में गूँजे, तो दर्शक दीर्घा में बैठा हर व्यक्ति अद्वैत भाव में सराबोर हो गया।

जन-मानस में गूंजता एकात्म भाव

एकात्म पर्व के इन कार्यक्रमों ने यह सिद्ध कर दिया कि आचार्य शंकर का ज्ञान केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संगीत, नृत्य और लोक समाज की संस्कृति में रचा-बसा है। ओंकारेश्वर की इस पुण्य भूमि पर हुई इन प्रस्तुतियों ने युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और महान सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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