
भुवनेश्वर, 24 अप्रैल (हि.स.)। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने 13वीं शताब्दी के कोणार्क सूर्यमंदिर के सभाकक्ष से रेत हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, अक्षय तृतीया से सुरंग निर्माण के लिए खुदाई कार्य आरंभ किया गया है। यह परियोजना यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है।
प्रारंभिक चरण में चार कुशल श्रमिकों द्वारा बिना किसी मशीनरी के मैनुअल तरीके से खुदाई की जा रही है, ताकि संरचना को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। चौथे दिन तक लगभग 2 फीट चौड़ाई और 4 फीट लंबाई तक खुदाई कार्य पूरा कर लिया गया है। पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए विशेष टीम तैनात की गई है, जो हर चरण में सटीकता और सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, साल 1903 में ब्रिटिश इंजीनियरों ने संरचना को ढहने से बचाने के लिए मंदिर को रेत से भर दिया था। मंदिर के सभाकक्ष में पश्चिम दिशा से सुरंग बनाकर रेत भरी गई थी, जो प्रथम स्तर से लगभग 80 फीट ऊपर स्थित थी। बाद में इस मार्ग को पत्थर की दीवार से बंद कर दिया गया था।
वर्तमान में मंदिर की पत्थर संरचना का विस्तृत आकलन किया जा रहा है, जिसके तहत दो और कोर ड्रिलिंग की योजना बनाई गई है। आईआईटी मद्रास द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि सभाकक्ष से रेत हटाने से मंदिर की संरचना को कोई खतरा नहीं होगा। इसी रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने सावधानीपूर्वक सुरंग निर्माण और रेत हटाने के कार्य को आगे बढ़ाया है, जो इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और एक प्रमुख पर्यटन स्थल यह मंदिर प्रतिवर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। गंगा वंश के राजा लंगुला नरसिंह देव प्रथम द्वारा सूर्य देव की पूजा के लिए निर्मित 800 वर्ष पुराने इस स्मारक को प्राकृतिक आपदाओं के कारण गंभीर रूप से काफी क्षति पहुंची है। ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि लगभग 1,200 पत्थर शिल्पकारों और कारीगरों ने क्लोराइट और बलुआ पत्थर का उपयोग करके 16 वर्षों में इस मंदिर का निर्माण किया था।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता महंतो