
नई दिल्ली, 27 अप्रैल (हि.स.)। गुजरात के गांधीनगर स्थित श्रीमती मानेकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स ने अपशिष्ट प्रबंधन के जरिये ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। संस्थान ने एलपीजी पर निर्भरता समाप्त कर बायोगैस आधारित रसोई व्यवस्था अपनाई है। इससे अब प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों के लिए भोजन तैयार किए जा रहे हैं।
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने बताया कि संस्थान में दो बायोगैस संयंत्र संचालित किए जा रहे हैं जिनकी संयुक्त क्षमता 90 घन मीटर प्रतिदिन है। इन संयंत्रों में ट्रस्ट की गौशाला में मौजूद 222 गायों का गोबर, रसोई का कचरा और आसपास के खेतों से प्राप्त कृषि अवशेष का उपयोग किया जाता है। उत्पन्न बायोगैस से संस्थान की पूरी रसोई की जरूरतें पूरी हो जाती हैं और एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता नहीं रहती। अधिकारियों ने बताया कि बिना इस संयंत्र के उन्हें हर महीने लगभग 30 एलपीजी सिलेंडरों की जरूरत पड़ती।
बायोगैस उत्पादन के बाद बचा हुआ स्लरी जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग किया जाता है, जिससे पूरी तरह जैविक खेती संभव हो रही है। यह पहल न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता बल्कि रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी सहायक है।
गुजरात ऊर्जा विकास एजेंसी (जीईडीए) संस्थागत बायोगैस संयंत्रों के लिए 25 से 85 घन मीटर क्षमता तक वित्तीय सहायता प्रदान करती है। गैर-लाभकारी संस्थानों को 75 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलती है। पिछले पांच वर्षों में राज्य में लगभग 193 संस्थागत बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए हैं। इस मॉडल से स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, जैविक खेती को बढ़ावा और अपशिष्ट का वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित हो रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर