
मुंबई, 08 अप्रैल (हि.स)। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अनुमानित आर्थिक वृद्धि दर 7.6 फीसदी से कम है।
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की समीक्षा बैठक के बाद कहा कि रिजर्व बैंक ने भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। यह अनुमान वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों को ध्यान में रखते हुए लगाया गया है। उन्होंने बताया कि इसके साथ ही रेपो दर को 5.25 फीसदी पर स्थिर रखा गया है। आरबीआई गवर्नर ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के कारण जिंस की ऊंची कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी चिंताओं से वृद्धि दर में यह नरमी रह सकती है।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए आरबीआई गवर्नर ने कहा कि प्रमुख समुद्री मार्गों में व्यवधान एवं इसके कारण ढुलाई तथा बीमा लागत में वृद्धि से माल निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों के युक्तिकरण का असर, विनिर्माण क्षेत्र में क्षमता उपयोग में वृद्धि तथा वित्तीय संस्थानों एवं कॉरपोरेट के मजबूत बही-खाते घरेलू मांग को समर्थन देंगे।
मल्होत्रा ने कहा कि ऊर्जा और अन्य जिंस की ऊंची कीमतें, साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्तपन्न व्यवधान से आपूर्ति को लगे झटके चालू वित्त वर्ष 2026-27 में घरेलू उत्पादन की गति को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आरबीआई के अनुसार पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 6.8 फीसदी, दूसरी तिमाही में 6.7 फीसदी, तीसरी तिमाही में 7.0 फीसदी और चौथी तिमाही में 7.2 फीसदी रहने का अनुमान है।
संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ती अस्थिरता एवं उसके घरेलू वित्तीय परिस्थितियों पर असर से भी वृद्धि की संभावनाओं पर दबाव पड़ सकता है। केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित रणनीतिक व उभरते क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयास भारत की दीर्घकालिक वृद्धि संभावनाओं के लिए सकारात्मक हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में गंभीर व्यवधान उत्पन्न हुआ है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ऊंची कीमतों एवं धीमी वृद्धि की चुनौती खड़ी कर रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर