भोजशालाः एक और लंबित विवाद का पूर्ण समाधान

15 May 2026 19:20:53

भोपाल, 15 मई (हि.स.)। धार की ऐतिहासिक भोजशाला में इंदौर उच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया, उसका कानूनी अध्याय साल 2022 में शुरू हुआ था। उस समय रंजना अग्निहोत्री और उनके सहयोगियों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से न्यायालय में याचिका दायर की थी। याचिका में भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को वहां पूर्ण पूजा अधिकार देने की मांग की गई थी।

साक्ष्य जुटाने की कवायद

हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर 11 मार्च, 2024 को उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया। एएसआई ने 22 मार्च, 2024 से 98 दिनों तक परिसर का सर्वे किया और 15 जुलाई, 2024 को 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट अदालत में पेश की थी। उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने 6 अप्रैल, 2026 से इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की। 12 मई 2026 तक चली सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने अपने-अपने दावे और साक्ष्य अदालत में पेश किए। करीब एक महीने से ज्यादा चली सुनवाई के दौरान अदालत में हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्य और धार्मिक दावे रखे गए। सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

हिन्दू पक्ष के तर्क

हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के दिए तर्क सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य कोर्ट में पेश किए। हिंदू पक्ष ने कहा कि परिसर में मिले स्तंभ, देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक, संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। ब्रिटिशकालीन गजेटियर और इतिहासकारों के दस्तावेजों में भी भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा केंद्र बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि यहां लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा रही है और परिसर के कई संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पहले के हैं।

मुस्लिम पक्ष की दलील

मुस्लिम पक्ष ने एएसआई रिपोर्ट पर उठाए सवाल मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में एएसआई की सर्वे रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया। उनका कहना था कि यह रिपोर्ट हिंदू पक्ष के दावों को मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। हालांकि एएसआई ने अदालत में स्पष्ट कहा कि सर्वे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से किया गया और इसमें मुस्लिम समुदाय के विशेषज्ञ भी शामिल थे।

भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि यहां मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र था। बताया जाता है कि 12वीं-13वीं शताब्दी में मंदिर को ध्वस्त कर वहां मकबरा और मस्जिद का निर्माण किया गया। रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के रिसर्च पेपर ‘धार, भोज और सरस्वती’ के अनुसार “भोजशाला” शब्द का उपयोग पहली बार जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में किया था। बाद में ब्रिटिश अधिकारी के.के. लेले ने भी इस स्थल का उल्लेख किया और यहां मिले संस्कृत शिलालेखों की व्याख्या शुरू करवाई। इसी दौरान यह बात सामने आई कि वर्तमान ढांचे का निर्माण ध्वस्त मंदिर के अवशेषों से किया गया था।

विवाद पुराना है

आजादी के बाद कैसे बढ़ा विवाद 1951 में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। फिर 1952 में हिंदुओं ने यहां भोज दिवस मनाना शुरू किया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ा। इसके जवाब में 1953 में मुस्लिम समुदाय ने यहां उर्स मनाना शुरू किया। इसके बाद लंबे समय तक व्यवस्था बनी रही कि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज पढ़ता रहा और वसंत पंचमी पर हिंदू समाज पूजा करता रहा। फिर 1961 में इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन गए और वाग्देवी की प्रतिमा के भारतीय मूल के होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए, हालांकि प्रतिमा वापस नहीं लाई जा सकी।

अयोध्या विवाद के बाद भोजशाला का मुद्दा भी तेजी से उभरा। दक्षिणपंथी संगठनों ने यहां हिंदू पूजा के पूर्ण अधिकार की मांग तेज कर दी। 1994 में विश्व हिंदू परिषद द्वारा स्मारक पर झंडा फहराने की चेतावनी के बाद धार में कर्फ्यू जैसी स्थिति बन गई। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौते के बाद मंगलवार और शुक्रवार को पूजा-नमाज की व्यवस्था जारी रही। 1997 में एक बार फिर विश्व हिंदू परिषद ने स्मारक पर झंडा फहराने का ऐलान किया, जिसके बाद प्रशासन ने आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी।

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हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी

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