बहुत लम्बी है भोजशाला संघर्ष की ये हिन्दू व्यथा कथा...

15 May 2026 21:18:53
धार, भाेजशाला का संघर्ष


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल, 15 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश में मालवा की धरती पर खड़ी भोजशाला सिर्फ पत्थरों, स्तंभों और खंडहरों का समूह नहीं है, यह एक ऐसा प्रतीक बन चुकी है, जहां इतिहास की परतों में दबी आस्था, राजनीति की तपिश, पुरातत्व की भाषा और अदालत की बहसें एक साथ दिखाई देती हैं। धार की यह प्राचीन धरोहर वर्षों तक एक धार्मिक स्थल का विवाद बन कर रही है, किंतु हिन्दू आस्था और उससे उमड़ी जन भावनाओं ने इसे केंद्र में बनाए रखा। हजारों लोग सड़कों पर उतरे, गांव-गांव में धर्मरक्षा समितियां खड़ी हुईं और पूरे मालवा में अपने आराध्य के स्थल को पुन: प्राप्त करने के लिए समय-समय पर जनजागरण एवं आंदोलन होते रहे।

भोजशाला संघर्ष की यह कथा वास्तव में उन लोगों की भी व्यथा है, जिन्होंने इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ कर देखा, लेकिन इस विवाद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस संघर्ष की हुई, जिसने धार को कई बार तनाव, कर्फ्यू, लाठीचार्ज और अदालतों की चौखट तक पहुंचाया।

भोजशाला विवाद की जड़ें करीब एक हजार वर्ष पुराने इतिहास में जाती हैं, जब परमार वंश के महान शासक राजा भोज के शासनकाल में यहां सरस्वती सदन और संस्कृत अध्ययन केंद्र का निर्माण हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार यह विद्या, दर्शन और संस्कृति का केंद्र था। मालवा की सांस्कृतिक चेतना में राजा भोज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। इसी कारण भोजशाला को लेकर भावनात्मक जुड़ाव और गहरा होता गया। हिंदू पक्ष शुरू से ही यह दावा प्रस्तुत करता रहा है कि यहां मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी और यह स्थान विद्या की आराधना का प्रमुख केंद्र था।

समय के साथ आक्रमण हुए, सत्ता बदली और संरचनाओं का स्वरूप भी बदलता गया। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह परिसर कमाल मौला मस्जिद के रूप में स्थापित हुआ और लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है। यहीं से दो दावों के बीच संघर्ष की जमीन तैयार हुई।

भोजशाला विवाद लंबे समय तक सीमित बहसों में रहा, किंतु 1990 के दशक में यह एक व्यापक जनआंदोलन में बदल गया। वर्ष 1994 में धार में सरस्वती वंदना और हनुमान चालीसा के सार्वजनिक पाठ ने आंदोलन को नई दिशा दी। धीरे-धीरे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठनों ने इसे “भोजशाला मुक्ति आंदोलन” का स्वरूप देना शुरू किया। उस दौर में मालवा के गांवों में सभाएं होने लगीं। धार्मिक यात्राएं निकाली गईं। युवाओं को जोड़ा गया। इस तरह भोजशाला मुक्ति आंदोलन धार के आसपास के जिलों तक फैल गया।

टकराव की पहली बड़ी आहट-

छह दिसंबर 1996 को विश्वहिन्दू परिषद के आह्वान पर शौर्य दिवस कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। पुलिस बल बढ़ाया गया। आंदोलनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं थे और प्रशासन कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जता रहा था। यहीं से आंदोलन और शासन के बीच सीधा टकराव शुरू हुआ। भोजशाला का विवाद पहली बार प्रदेश स्तर से होता हुआ राष्ट्रीय स्तर पर बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बन गया।

1997 का फैसला और उफान पर पहुंचा आंदोलन

वर्ष 1997 भोजशाला विवाद का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। तत्कालीन सरकार ने मुस्लिम पक्ष को प्रत्येक शुक्रवार नमाज की अनुमति दे दी, जबकि हिंदू पक्ष के प्रवेश और पूजा-अर्चना पर प्रतिबंध लगाए गए। इस निर्णय ने आंदोलन को और तीखा बना दिया। हिंदू संगठनों ने इसे धार्मिक अधिकारों का हनन बताया। गांव-गांव में धर्मरक्षा समितियां सक्रिय हो उठीं। धार आंदोलन का केंद्र बन गया। हिन्दू जन में यह भावना गहराने लगी कि उनके सांस्कृतिक प्रतीकों को सीमित किया जा रहा है। इसी दौर में महिलाओं की बड़ी भागीदारी सामने आई। मातृशक्ति संगम में हजारों महिलाएं शामिल हुईं। आंदोलन परिवारों और सामाजिक समूहों तक फैल गया। यही कारण था कि भोजशाला आंदोलन मालवा के सबसे बड़े जनआंदोलनों में गिना जाने लगा।

सवा लाख लोगों का जमावड़ा और उग्र होती सड़कें

आंदोलन के सबसे तीखे चरण में धार की सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ी। आंदोलनकारियों के अनुसार एक लाख से अधिक धर्मरक्षकों ने भोजशाला मुक्ति का संकल्प लिया। हर ओर भगवा झंडे, धार्मिक नारे और भोजशाला को मुक्त कराने की मांग गूंज रही थी। प्रशासन ने हालात को नियंत्रित करने के लिए धारा 144 लागू कर दी। कई इलाकों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया गया। पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़पें हुईं। लाठीचार्ज और गिरफ्तारियों की घटनाएं सामने आईं।

संघर्ष इतना तीखा हो गया कि 39 आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हुए और दो लोगों की मौत ने पूरे क्षेत्र का माहौल बेहद तनावपूर्ण बना दिया। जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे। इन घटनाओं ने आंदोलन को और भावनात्मक बना दिया।

व्यवस्था और अस्थायी संतुलन-

लगातार बढ़ते जनदबाव और आंदोलन के बाद 8 अप्रैल 2003 को सरकार ने नई व्यवस्था लागू की। इसके तहत हिंदू पक्ष को प्रतिदिन दर्शन और प्रत्येक मंगलवार पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की व्यवस्था दी गई। इस निर्णय के बाद धार में विजय उत्सव मनाया गया। मंदिरों में महाआरती हुई। आंदोलनकारियों ने इसे आंशिक जीत माना, किंतु यह समाधान स्थायी नहीं बन सका।

हर बार जब वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते, तनाव फिर बढ़ जाता। प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ती। भोजशाला विवाद बार-बार यह संकेत देता रहा कि यह धार्मिकता से अधिक संवेदनशील सामाजिक मुद्दा बन चुका है।

एएसआई सर्वे ने फिर बढ़ाई बहस

हाई कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे किया। ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार, खुदाई और तकनीकी विश्लेषण के जरिए परिसर की जांच की गई। 2000 से अधिक पेज की रिपोर्ट में कई ऐसे दावे सामने आए, जिन्होंने बहस को फिर तेज कर दिया। रिपोर्ट में मंदिर शैली के अवशेष, मूर्तियां, स्तंभ, शिलालेख और स्थापत्य सामग्री मिलने का उल्लेख किया गया। एएसआई ने दावा किया कि वर्तमान ढांचे में पूर्ववर्ती संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग हुआ है।

106 स्तंभ और 82 पिलास्टर मंदिर स्थापत्य से जुड़े बताए गए। संस्कृत और प्राकृत अभिलेखों को अरबी-फारसी लेखों से पुराना बताया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद की संरचना जल्दबाजी में निर्मित प्रतीत होती है। इन निष्कर्षों ने हिंदू पक्ष के दावों को नई ताकत दी, जबकि मुस्लिम पक्ष ने रिपोर्ट की व्याख्या पर सवाल उठाए। पर अब सच सभी के सामने आ चुका था, न्यायालय में अब इतिहास और पुरातत्व की भाषा सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बन चुकी है।

वाग्देवी प्रतिमा और सांस्कृतिक स्मृति का प्रश्न

भोजशाला विवाद में मां वाग्देवी की प्रतिमा भी बड़ा मुद्दा रही है। दावा किया जाता है कि 1875 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी, जिसे बाद में ब्रिटिश अधिकारी इंग्लैंड ले गए। हिंदू संगठनों ने कई बार प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग उठाई। आंदोलनकारी इसे भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक गौरव से जोड़ते रहे हैं।

न्यायालय के दरवाजे पर खड़ा इतिहास

वर्ष 2022 में हिंदू फ्रंट फार जस्टिस और भोज उत्सव समिति से जुड़े पक्षकारों ने हाई कोर्ट में नई याचिका दायर की। इसमें परिसर के मूल स्वरूप की वैज्ञानिक जांच और धार्मिक अधिकार तय करने की मांग की गई। अब पूरा मामला अदालत में इतिहास, आस्था, पुरातत्व और संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर खड़ा है। एक ओर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और एएसआई रिपोर्ट हैं, दूसरी ओर धार्मिक परंपरा और नमाज का दावा।

उल्लेखनीय है कि इंदौर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई को एक कानूनी विवाद नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस निर्णय के रूप में देखा जा रहा है जो मालवा की सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकता है। भोजशाला की यह कथा उन पीढ़ियों की कहानी भी है, जिन्होंने इसे अपने विश्वास से जोड़ा, सड़कों पर संघर्ष किया, कर्फ्यू झेला, लाठियां खाईं और वर्षों तक फैसले की प्रतीक्षा की। तब कहीं जाकर आज की पीढि़यों के सामने यह शुभ दिन आया है।

“हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस” के प्रदेश संयोजक आशीष जैन इस अवसर पर कहते हैं कि इस दिन का वर्षों से इंतजार था, सत्य परेशान हो सकता है, किंतु आखिर में जीत उसी की होती है, भोजशाला मां वाग्देवी का मंदिर है, यह ज्ञान का क्षेत्र है, यहां ज्ञान का ही कार्य होना चाहिए। वास्तव में यह सफलता किसी एक वर्ग या समुदाय की नहीं, संपूर्ण हिन्दू समाज की जीत है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

Powered By Sangraha 9.0