
- जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यसमिति का दो दिवसीय अधिवेशन संपन्न
नई दिल्ली,
17 मई (हि.स.)। नफरत की राजनीति की जगह अब धमकी और
डर की राजनीति ने ले ली है। इसका उद्देश्य केवल मुसलमानों को डराकर यह एहसास दिलाना
है कि अब उन्हें इस देश में शर्तों के साथ जीवन बिताना होगा और जो ऐसा नहीं करेगा उसकी
जगह जेल में होगी। इस प्रकार की नई राजनीति कानून और संविधान की सर्वोच्चता पर गंभीर
प्रश्नचिह्न है।
यह बातें जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने जमीअत
की कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक के समापन के अवसर पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहीं
है। मौलाना ने कहा कि सत्ता प्राप्त करने के लिए कुछ लोग देश के अमन, एकता और भाईचारे के साथ खतरनाक खिलवाड़ कर रहे हैं।
राजनीति की इस नई शैली ने पूरे देश में नफरत और धार्मिक उन्माद की नई लहर पैदा कर दी
है। हालात इतने विस्फोटक हो चुके हैं कि हर तरफ ज़हर उगला जा रहा है, मुसलमानों को अपमानित किया जा रहा है और कानून के
रखवाले मूकदर्शक बने हुए हैं।
मौलाना मदनी ने आगे
कहा कि हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। इसमें खास तौर पर पश्चिम
बंगाल और असम में खुलेआम चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाई गईं। मुसलमानों को सार्वजनिक
रूप से धमकियां दी गईं। चुनाव जीतने के बाद भी धमकियों का यह सिलसिला जारी है। उन्होंने
कहा कि किसी नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री का यह कहना कि मुसलमानों ने हमें वोट नहीं दिया, इसलिए हम उनका काम नहीं करेंगे,
संविधान और लोकतंत्र दोनों का मजाक उड़ाने जैसा
है। उन्होंने कहा कि संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है और लोकतंत्र हर नागरिक
को अपनी पसंद का नेता चुनने का अधिकार देता है। यदि कोई नागरिक किसी दल या नेता को
वोट नहीं देता, तो यह कोई अपराध नहीं है, लेकिन आज की राजनीति में इसे भी अपराध बना
दिया गया है।
मौलाना ने कहा कि शासकों ने डर
और भय की राजनीति को अपना तरीका बना लिया है, जबकि सरकारें डर से नहीं, बल्कि न्याय और इंसाफ से चलती हैं। उन्होंने कहा कि हर मुख्यमंत्री ईश्वर को साक्षी मानकर यह शपथ लेता है कि वह संविधान
और कानून के अनुसार बिना किसी भय, पक्षपात, प्रेम या शत्रुता के सभी वर्गों के साथ न्याय करेगा।
इस शपथ के बिना कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बन सकता और न ही उस पद पर बने रहने का
नैतिक अधिकार रखता है।
मौलाना मदनी ने स्पष्ट
शब्दों में कहा कि देश को योजनाबद्ध तरीके से एक वैचारिक राष्ट्र में बदलने की कोशिश
की जा रही है। संवैधानिक संस्थाओं की निष्क्रियता के कारण यह प्रयास सफल भी होता जा
रहा है। कई राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जा चुकी है और अब असम में भी इसे
लागू करने की तैयारी चल रही है।
उन्होंने कहा कि एक अधिसूचना के माध्यम से वंदे मातरम् गीत को राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया है और भाजपा शासित राज्यों में इसे
अनिवार्य भी किया जा रहा है। दूसरी ओर मस्जिदों, मकबरों और मदरसों को अवैध बताकर गिराया जा रहा है। मदरसों के
खिलाफ रोज़ नए-नए आदेश जारी किए जा रहे हैं, मानो वे शैक्षणिक संस्थान न होकर गैरकानूनी गतिविधियों के केंद्र
हों। उन्होंने कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही है और कई मामलों
में अदालतों से न्याय भी मिला है।
इस अवसर पर मौलाना मदनी ने घोषणा की कि जमीअत उलमा-ए-हिंद
जल्द ही केंद्रीय और प्रांतीय स्तर पर मदरसा बोर्ड गठित करेगी, जिससे सभी मदरसों को जोड़ा जाएगा और उनसे संबंधित
समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएंगे।
उन्होंने यह भी कहा
कि समान नागरिक संहिता के खिलाफ हमारी कानूनी लड़ाई जारी है। वंदे मातरम् को अनिवार्य
किए जाने के खिलाफ भी अब कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी, क्योंकि यह गीत हमारे धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध है और इसे
अनिवार्य बनाकर हमारी धार्मिक स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास किया जा रहा है।
जमीअत
उलमा-ए-हिंद की केंद्रीय कार्यसमिति ने केंद्र सरकार के उस निर्णय को पूरी तरह खारिज
कर दिया है, जिसके तहत वंदे मातरम्
को राष्ट्रगान “जन गण मन”
के समान दर्जा देने, उसके सभी छह बंद अनिवार्य करने तथा सभी सरकारी एवं शैक्षणिक
संस्थानों के कार्यक्रमों में “जन गण मन”
से पूर्व उसका पाठ करना आवश्यक घोषित किया गया है।
जमीअत उलमा-ए-हिंद ने इसे भारतीय संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों तथा संविधान सभा के ऐतिहासिक निर्णयों
के प्रतिकूल बताते हुए सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
हिन्दुस्थान समाचार/
मोहम्म्द ओवैस
हिन्दुस्थान समाचार / Abdul Wahid