
नई दिल्ली, 19 मई (हि.स.)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने मंगलवार को कहा कि मानवाधिकार संस्थानों को कानून (मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम) के दायरे और अपने तय अधिकार क्षेत्र में रहकर ही काम करना चाहिए ताकि बेवजह के मुकदमों से बच सकें।
वी. रामासुब्रमणियन ने नई दिल्ली स्थित एनएचआरसी परिसर में राज्य मानवाधिकार आयोगों (एसएचआरसी), अपने विशेष प्रतिवेदकों और विशेष पर्यवेक्षकों के साथ 'वर्चुअल मोड' में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन पर यह बात कही। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य नीतिगत उद्देश्यों और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच के अंतर को पाटना तथा मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण विकसित करना था।
रामासुब्रमणियन ने कहा, मानवाधिकार संस्थानों को 'मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम' के तहत दी गई परिभाषाओं और अपने निर्धारित क्षेत्राधिकार के भीतर ही काम करना चाहिए। जब अधिकार क्षेत्र बिल्कुल साफ होता है, तो बेवजह के मुकदमों से बचा जा सकता है और आयोग ज्यादा बेहतर व असरदार तरीके से काम कर पाएंगे।
उन्होंने मामलों के दोहराव से बचने और बेहतर समन्वय के लिए सभी राज्य आयोगों से अपने कामकाज को डिजिटल बनाने और एनएचआरसी के एकीकृत एचआरसीनेट पोर्टल से जुड़ने का आग्रह किया।
एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने इस संवाद को दोनों मंचों के बीच समन्वय मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।
एनएचआरसी के सदस्य विजया भारती सयानी ने एसएचआरसी से प्रभावित समुदायों के साथ जुड़ाव बढ़ाने और जमीनी स्तर पर क्षेत्रीय दौरों में तेजी लाने का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने जन सहायता के लिए संपर्क विवरण प्रदर्शित करने की कर्नाटक सरकार की पहल की सराहना की।
एनएचआरसी के महासचिव भरत लाल ने अपने उद्घाटन भाषण में बताया कि मानवाधिकार एक जटिल विषय है जिसके लिए सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने पिछले 5 वर्षों में ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से प्राप्त 4.28 लाख शिकायतों का विश्लेषण प्रस्तुत किया, जो मुख्य रूप से कई श्रेणियों से संबंधित हैं।
इनमें पुलिस संबंधी उल्लंघन 18 प्रतिशत, माफियाओं द्वारा संगठित शोषण 17.4 प्रतिशत, सेवा संबंधी मामले (पेंशन/वेतन न मिलना) 6 प्रतिशत, महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन 5.8 प्रतिशत, जेलों और कारागारों की स्थिति 3.5 प्रतिशत, श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन 2.2 प्रतिशत, स्वास्थ्य और शैक्षणिक संस्थानों में उल्लंघन 2 प्रतिशत (प्रत्येक) और बाल अधिकारों का उल्लंघन 1.7 प्रतिशत शामिल है।
उन्होंने हिरासत में हुई मौतों, आश्रय गृहों में दुर्व्यवहार, हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्केवेंजिंग) के कारण होने वाली मौतों और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की दयनीय स्थिति पर सक्रिय निगरानी रखने की आवश्यकता जताई।
डिजिटल गवर्नेंस के तहत देश के 23 राज्य मानवाधिकार आयोग एचआरसीनेट पोर्टल से जुड़ चुके हैं। हालांकि, आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड और नागालैंड के एसएचआरसी अभी तक इससे नहीं जुड़े हैं। वहीं, मध्य प्रदेश और राजस्थान के एसएचआरसी पोर्टल से जुड़ने के बावजूद अभी तक इस पर शिकायतों का ऑनलाइन प्रसंस्करण शुरू नहीं कर पाए हैं।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न राज्यों (जैसे हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, असम, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक आदि) के प्रतिनिधियों और विशेष प्रतिवेदकों द्वारा कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए।
इनमें संस्थागत और प्रशासनिक सुधारों में-
राज्य सरकारों द्वारा कर्मचारियों की संख्या और बुनियादी ढांचे में सुधार कर एसएचआरसी को मजबूत बनाया जाए। जेलों में भीड़ कम करने, रहने की स्थिति सुधारने और कैदियों के वेतन का मानकीकरण करने जैसे जेल सुधार लागू किए जाएं। निहित स्वार्थों और धोखाधड़ी करने वाले संगठनों द्वारा मानवाधिकार मंचों के दुरुपयोग को रोकने के लिए एनएचआरसी के निर्देशों का कड़ाई से पालन हो।
संवेदनशीलता और निवारक उपाय-
मानवाधिकार उल्लंघन के बाद केवल दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस, सुधार गृह स्टाफ और सीएपीएफ के नियमित प्रशिक्षण के माध्यम से निवारक हस्तक्षेप पर ध्यान केंद्रित किया जाए। जेलों, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों, नशामुक्ति केंद्रों, आश्रय गृहों और वृद्धाश्रमों में नियमित व समन्वित क्षेत्रीय दौरे किए जाएं।
कमजोर वर्गों का संरक्षण और पर्यावरण न्याय-
बंधुआ मजदूरी और बाल श्रम से मुक्त कराए गए बच्चों का जिला प्रशासन और पुलिस के समन्वय से उचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए। अंतर्लिंगी (इंटरसेक्स) शिशुओं, दिव्यांगों, कुष्ठ पीड़ितों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों व पुनर्वास पर विशेष जोर दिया जाए। प्रदूषण, जल संदूषण तथा जलवायु संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए वैज्ञानिक और वास्तविक समय (रियल-टाइम) पर्यावरण निगरानी प्रणालियों का उपयोग किया जाए। कचरा स्थलों पर काम करने वाले श्रमिकों, खदान श्रमिकों और ट्रक चालकों जैसे संवेदनशील समूहों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा, बीमा और सिलिकोसिस जैसी बीमारियों के लिए निवारक तंत्र मजबूत किए जाएं।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी