आदिवासियों के सामने धर्मांतरण की चुनौती

25 May 2026 00:04:53
आदिवासी सांस्कृतिक कार्यक्रम।


नई दिल्ली, 24 मई (हि.स.)। सरकार का एक तरफ मुख्य लक्ष्य आदिवासी समुदायों को विकास की मुख्यधारा में लाना है, वहीं वर्तमान में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इस वर्ग में बढ़ रहे धर्म परिवर्तन को रोकने और उनकी 'घर वापसी' (मूल संस्कृति की ओर झुकाव) सुनिश्चित करने की है।

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में लाल किले में देश भर से एकत्रित हुए आदिवासियों ने रविवार को आयोजित भव्य 'जनजातीय सांस्कृतिक शोभायात्रा' और एक विशाल 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' में धर्म परिवर्तन के खिलाफ एक साथ आवाज उठाई।

अखिल भारतीय कल्याण आश्रम (वनवासी कल्याण आश्रम) की ओर से आए अरुणाचल के कई व्यक्तियों ने निराशा व्यक्त करते हुए, हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि उनके राज्य में करीब 80 प्रतिशत लोगों ने धर्म परिवर्तन कर चुके हैं। कोई ईसाई धर्म में चला गया तो किसी ने मुस्लिम धर्म अपना लिया। उन्होंने कहा कि उनके आने मकसद सिर्फ और सिर्फ धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासी लोगों की घर वापसी करवाना है।

सभी ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वे लोग घर वापसी नहीं करते हैं तो उनका एसटी स्टेटस हटाया जाए। उन्हें आदिवासी के नाम पर जो लाभ और अधिकार मिल रहे हैं, वे बंद होने चाहिए।

पूर्वोत्तर के उस समूह ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर यह ऐसे ही चलता रहा तो वे हमारे राज्य को भी नागालैंड की तरह 'क्रिश्चियन स्टेट' (यीशु का स्टेट) बना देंगे। इसी को लेकर हम सभी यहां आए हैं ताकि लोगों को आगाह कर सकें।

उन्होंने बताया कि 'अरुणाचल इंडीजीनस फेथ एंड कल्चर सोसाइटी' और 'अरुणाचल इंडीजीनस फोरम' इसके खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। 1978 के उस एक्ट के लागू न होने से बाहर के लोगों ने पैसे और कपड़ों का लालच देकर लोगों का धर्मांतरण कराया। अब हम जो थोड़े बहुत बचे हैं, वही संघर्ष कर रहे हैं।

स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच लगातार पूरे देश में यह आंदोलन और जन जागरण चला रहा है ताकि हमारे हक, अधिकार और शान की रक्षा हो सके। जो वर्षों से अन्याय चल रहा है, उसे दूर करना है। जो हमारी संस्कृति, परंपरा और धर्म को छोड़ चुके हैं, वे लोग हमारा हक छीन रहे हैं। यह बहुत बड़ा अन्याय है और हम इसे अब बर्दाश्त नहीं करेंगे। हमारी पहचान हमारी संस्कृति से है। अगर संस्कृति समाप्त हुई, तो अस्तित्व भी मिट जाएगा। उनका कहना है कि पूजा ही हमारी संस्कृति है। देश में सनातन संस्कृति से हमें दूर करने के लिए कई प्रकार के षड्यंत्र चल रहे हैं और भ्रम फैलाया जा रहा है। हमें भ्रमित नहीं होना है, अपनी जड़ों से जुड़े रहना है। इस सनातन रूपी वट वृक्ष की शीतल छाया में हम सब सुख-शांति से हैं।

उन्होंने बताया कि अरुणाचल प्रदेश में अभी 'अरुणाचल प्रदेश इंडीजीनस यूथ आर्गेनाइजेशन' द्वारा 'एसटी बचाओ' आंदोलन के तहत 28 से 31 मई तक चार दिनों का बंद कॉल किया गया है। इसका कारण यह है कि असम से जो बांग्लादेशी घुसपैठिए भगाए जा रहे हैं, वे बांग्लादेश न जाकर अरुणाचल में बस्तियां बसा रहे हैं अवैध मस्जिदें और मदरसे खोल रहे हैं। प्रशासन को इस पर रोक लगानी चाहिए। सरकार से अपील है कि जनसंख्या के इस बदलते स्वरूप को रोकने के लिए अवैध मदरसों और मस्जिदों के निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जाए।

सिर पर लगी पारम्परिक टोपी का महत्व समझाते हुये कहा कि यह हमारा ट्रेडिशनल कैप (टोपी) है। यह अरुणाचल प्रदेश के निशी समाज का है, इसे हम लोग 'बोपा' बोलते हैं। अभी तो यह लकड़ी (काठ) से बनाया गया है, लेकिन इसका ओरिजिनल जो हॉर्नबिल पंछी होता है, उसका लगाया जाता है लेकिन अब चिड़िया मारना मना हो गया है। इसलिए हम चिड़िया का नहीं लगाते बल्कि लकड़ी का लगाते हैं।

छतीसगढ़ के अलग-अलग दो जिलों से आई समाज सेविकाओं में से एक ने धर्म परिवर्तन को लेकर मुद्दा उठाते हुए कहा कि हम सभी लोगों की तमाम समस्याओं में धर्म परिवर्तन ने भी अपने पैर पसार लिए हैं। उनके जिले में भारी संख्या में लोगों ने दूसरों धर्मों की तरफ जाना शुरू कर दिया है। आज इस मंच से अपने समाज के तमाम लोगों को जागरूक करने और उनसे अपील करने आए हैं।

वहीं दंतेवाड़ा जिले की एक अन्य राष्ट्रीय महिला समिति और कल्याण आश्रम की कार्यकर्ता, समाज सेविका ने कहा कि हमारा हक हमें मिलना चाहिए जो लोग बाहर से आए हैं। उन्हें सब सुविधाएं मिल रही हैं, वह नहीं मिलनी चाहिए।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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