एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चुनाव आयोग पर कई सवाल खड़े हुएः कांग्रेस

27 May 2026 18:57:53
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी एसआईआर पर पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए।


नई दिल्ली, 27 मई (हि.स.)। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने एसआईआर की संवैधानिक वैधता को स्वीकार किया है, लेकिन फैसले में कई ऐसे बिंदु हैं जो चुनाव आयोग की प्रक्रिया और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।

सिंघवी ने बुधवार को कांग्रेस मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि नागरिकता तय करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। नागरिकता अधिनियम के तहत यह अधिकार सक्षम प्राधिकारी- जैसे गृह मंत्रालय के पास है। इसके बावजूद करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और उनका मताधिकार प्रभावित हुआ।

उन्होंने कहा कि न्यायालय के फैसले के पैरा 97 से 101 तक पढ़ने से स्पष्ट होता है कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। बिहार में 65 लाख मतदाताओं के निष्कासन और बाद में उनके नाम दोबारा प्रकाशित किए जाने पर सिंघवी ने कहा कि यह सुधार राजनीतिक दलों और गैर सरकारी संगठनों की अदालत में दायर याचिकाओं के कारण संभव हो पाया।

सिंघवी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में खामियों के साथ एसआईआर कार्यक्रम लागू किया। यदि राजनीतिक दलों, गैर सरकारी संगठनों और सिविल सोसायटी ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो प्रक्रिया में मौजूद खामियां बनी रहतीं।

उन्होंने कहा कि एसआईआर की सबसे बड़ी समस्या अत्यंत कम समय सीमा है। बिहार में इसके लिए चार महीने और पश्चिम बंगाल में पांच महीने का समय दिया गया। यदि इसे आगामी चुनावों से अलग समय पर लागू किया जाता तो इतनी समस्याएं नहीं होतीं।

सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग पहले लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाता है और बाद में निर्णय की प्रक्रिया चलती है। इस बीच चुनाव संपन्न हो जाते हैं। इस पहलू पर उच्चतम न्यायालय को चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करनी चाहिए थी।

उन्होंने कहा कि न्यायालय ने अपने फैसले में आधार और राशन कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना है। इसी तर्क से जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और 10वीं की अंकतालिका जैसे दस्तावेज भी नागरिकता के अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते, जबकि चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया में इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की।

सिंघवी ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर अपील की व्यवस्था बनाई गई। लगभग छह हजार अपीलों में चार हजार अपीलें स्वीकार की गईं। इससे स्पष्ट होता है कि बड़ी संख्या में लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे, जबकि चुनाव पहले ही संपन्न हो चुके थे।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक ठहराते हुए कहा कि इसका उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करना और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराना है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता और संदिग्ध नागरिकता वाले मामलों को गृह मंत्रालय के पास भेजना होगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

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