आईआईटी जोधपुर का नया शोध, अब कैंसर मरीजों के लिए डॉक्टरों को सही दवा चुनने में मिलेगी मदद

16 Jun 2026 17:50:53
jodhpur


जोधपुर, 16 जून (हि.स.)। व्यक्तिगत (पर्सनलाइज्ड) कैंसर उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जोधपुर के शोधकर्ताओं ने ऐसे नई पीढ़ी के प्रेडिक्टिव बायोमार्कर्स विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब डॉक्टर यह अनुमान लगाने में सक्षम होंगे कि कौन-से कैंसर मरीज कीमोथेरेपी या अन्य कैंसर-रोधी उपचारों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकते हैं। इस शोध से चिकित्सकों को उपचार शुरू होने से पहले ही सही मरीज के लिए सही दवा चुनने में मदद मिलेगी।

भारत में हर वर्ष लगभग 5.9 लाख से अधिक लोगों की कैंसर से मृत्यु होती है। आधुनिक उपचार पद्धतियों के बावजूद बड़ी संख्या में मरीज उपचार के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, जिससे उपचार की प्रभावशीलता कम हो जाती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए आईआईटी जोधपुर के वैज्ञानिक कैंसर बायोलॉजी, प्रिसीजन मेडिसिन और ट्रांसलेशनल थेरेप्यूटिक्स के क्षेत्र में अत्याधुनिक अनुसंधान कर रहे हैं।

इस शोध का नेतृत्व आईआईटी जोधपुर के बायोसाइंस एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं ट्यूमर माइक्रोएनवायरनमेंट लेबोरेटरी के प्रमुख डॉ. दिनेश कुमार अहिरवार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि शोध का उद्देश्य यह समझना है कि कुछ मरीज उपचार का बेहतर लाभ क्यों प्राप्त करते हैं जबकि अन्य मरीजों में उपचार प्रभावी नहीं होता। उपचार प्रतिरोध के पीछे कार्यरत आणविक और कोशिकीय तंत्रों की पहचान कर चिकित्सकों को बेहतर उपचार निर्णय लेने में सहायता प्रदान की जा सकेगी।

शोध दल कैंसर कोशिकाओं का अध्ययन करने के लिए सिंगल-सेल सीक्वेंसिंग, मल्टीकलर हाई-पैरामीटर फ्लो साइटोमेट्री, आधुनिक आणविक जीवविज्ञान तकनीकों और कम्प्यूटेशनल विश्लेषण का उपयोग कर रहा है। इन तकनीकों की मदद से ट्यूमर के भीतर मौजूद अलग-अलग कैंसर कोशिकाओं का गहन अध्ययन संभव हो रहा है, जिससे दवा प्रतिरोध के कारणों को समझने में सहायता मिल रही है।

वैज्ञानिकों ने उपचार-प्रतिरोधी ट्यूमर में सक्रिय विशेष आणविक मार्गों की पहचान भी की है। इसके आधार पर पहले से स्वीकृत दवाओं को कीमोथेरेपी के साथ मिलाकर उपयोग करने की संभावनाओं पर कार्य किया जा रहा है। इस ड्रग रिपर्पजिंग रणनीति से नई दवाओं के विकास में लगने वाले समय और लागत को कम करते हुए उपचार की सफलता बढ़ाई जा सकती है।

शोधकर्ता उन्नत प्रीक्लिनिकल कैंसर मॉडल, ह्यूमनाइज्ड माउस मॉडल और मरीज-विशिष्ट लंग-ऑन-चिप सिस्टम का भी उपयोग कर रहे हैं। ये तकनीकें मानव शरीर में उपचार के प्रभावों का अधिक सटीक आकलन करने में सहायक हैं। इसके अलावा यह शोध सिलिकोसिस जैसी व्यावसायिक बीमारियों के अध्ययन में भी उपयोगी साबित हो सकता है। डॉ. अहिरवार ने कहा कि इस शोध का अंतिम लक्ष्य ऐसे बायोमार्कर्स विकसित करना है जो उपचार शुरू होने से पहले ही यह संकेत दे सकें कि कोई मरीज कीमोथेरेपी के प्रति प्रतिरोध विकसित करेगा या नहीं। इससे मरीजों को अनावश्यक उपचारों से बचाया जा सकेगा, उपचार की सफलता बढ़ेगी तथा शारीरिक, मानसिक और आर्थिक बोझ भी कम होगा।---------------------

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

Powered By Sangraha 9.0