
रुड़की, 19 जून (हि.स.)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिकों ने चिकनगुनिया वायरस के विरुद्ध लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता हासिल करते हुए गौमूत्र अर्क (काउ यूरिन डिस्टिलेट-सीयूडी) में मौजूद ऐसे जैव-सक्रिय यौगिकों की पहचान की है, जो वायरस की वृद्धि को प्रभावी ढंग से रोकने में सक्षम पाए गए हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रयोगशाला परीक्षणों में इन यौगिकों ने वायरल लोड में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है।
प्रतिष्ठित शोध पत्रिका एसीएस एग्रीकल्चरल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन का नेतृत्व आईआईटी रुड़की के जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग की प्रोफेसर शैल्ली तोमर और उनकी टीम ने किया। यह शोध आयुष मंत्रालय के सहयोग से देश के विभिन्न आयुर्वेदिक और जैव-चिकित्सीय संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पूरा किया गया।
शोध में उन्नत वायरोलॉजी, मेटाबोलोमिक्स, मॉलिक्यूलर डॉकिंग और जैव-रासायनिक विश्लेषण तकनीकों का उपयोग कर एंटीवायरल गतिविधि के लिए जिम्मेदार प्रमुख यौगिकों की पहचान की गई। अध्ययन के अनुसार सुरक्षित सांद्रता स्तरों पर गौमूत्र अर्क के प्रयोग से चिकनगुनिया वायरस की मात्रा में 90 प्रतिशत से अधिक कमी देखी गई।
शोधकर्ताओं ने बताया कि गौमूत्र अर्क, थाइमोक्विनोन और पाइपरीन के अनुकूलित संयोजन ने प्रयोगशाला परिस्थितियों में वायरल लोड को 99.85 प्रतिशत तक कम करने में सफलता हासिल की। अध्ययन में बेंजोइक एसिड, हिप्यूरिक एसिड और ओलिक एसिड को ऐसे प्रमुख घटकों के रूप में पहचाना गया, जो वायरस की प्रतिकृति प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर उसकी वृद्धि को रोकते हैं।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि उभरते वायरल रोगों से निपटने के लिए किफायती और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित समाधानों की आवश्यकता है। यह अध्ययन पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
अध्ययन की समन्वयक लेखिका प्रो. शैल्ली तोमर ने कहा कि शोध न केवल गौमूत्र अर्क में मौजूद विशिष्ट एंटीवायरल अणुओं की पहचान करता है, बल्कि प्राकृतिक यौगिकों के समन्वित फॉर्मुलेशन की प्रभावशीलता भी दर्शाता है। हालांकि, इन निष्कर्षों को चिकित्सीय उपयोग में लाने से पहले व्यापक प्री-क्लिनिकल और ट्रांसलेशनल अध्ययनों की आवश्यकता होगी।
चिकनगुनिया एक मच्छर जनित वायरल रोग है,जो मुख्य रूप से एडीज मच्छरों के जरिए फैलता है। इससे तेज बुखार, गंभीर जोड़ों का दर्द और लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। वर्तमान में इसके लिए प्रभावी एंटीवायरल उपचार सीमित हैं। ऐसे में आईआईटी रुड़की का यह अध्ययन भविष्य में प्राकृतिक यौगिकों पर आधारित नई एंटीवायरल दवाओं के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला