‘पंच परिवर्तन’ को जीवन में अपनाकर ही सशक्त समाज का निर्माण संभव : हरिश्चंद्र

22 Jun 2026 13:31:53
उत्तर क्षेत्र बौद्धिक शिक्षण प्रमुख हरिश्चंद्र, इंडसेपी की मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. शैलजा गुप्ता कार्यक्रम में शपथ दिलाते हुए।


नई दिल्ली, 22 जून (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के उत्तर क्षेत्र बौद्धिक शिक्षण प्रमुख हरिश्चंद्र ने स्वयंसेवकों और समाज के सभी वर्गों से अपने जीवन में ‘पंच परिवर्तन’ को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली, नागरिक कर्तव्यों का पालन और स्वदेशी के प्रति प्रतिबद्धता जैसे मूल्यों को व्यवहार में उतारकर ही सशक्त, संस्कारित और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण किया जा सकता है।

हरिश्चंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत द्वारा आयोजित संघ शिक्षा वर्ग (सामान्य) महाविद्यालयीन विद्यार्थी एवं तरुण व्यवसायी वर्ग के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के वसंत विहार स्थित ललित महाजन विद्यालय में आयोजित इस समारोह में इंडसेपी की मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. शैलजा गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं।

इन्द्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, पिछले 15 दिनों से संचालित इस प्रशिक्षण वर्ग में दिल्ली प्रांत के विभिन्न क्षेत्रों से आए 159 शिक्षार्थियों ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को शारीरिक दक्षता, मानसिक सुदृढ़ता, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर व्यावहारिक एवं वैचारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

अपने संबोधन में हरिश्चंद्र ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन, राष्ट्रचिंतन और संगठनात्मक दृष्टि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार का राष्ट्रीय जीवन विविध अनुभवों से समृद्ध था। कलकत्ता (अब कोलकाता) में एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान वे अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी संगठनों के संपर्क में रहे और स्वतंत्रता आंदोलन की विभिन्न धाराओं को निकटता से समझा। साथ ही वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों से भी जुड़े रहे। इन अनुभवों ने उनके राष्ट्रवादी चिंतन को व्यापक दृष्टि प्रदान की और उन्हें इस निष्कर्ष तक पहुंचाया कि राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम व्यक्ति निर्माण है।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना से ही व्यक्तित्व निर्माण और समाज संगठन उसके कार्य का मूल आधार रहा है। संघ का विश्वास है कि जब व्यक्ति में चरित्र, अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना विकसित होती है, तभी समाज संगठित और राष्ट्र सशक्त बनता है। उन्होंने कहा कि सुदृढ़ चरित्र, उच्च नैतिक मूल्यों और राष्ट्रनिष्ठा से युक्त व्यक्तियों का निर्माण ही राष्ट्र की प्रगति और उत्थान का वास्तविक आधार है।

संघ के वर्तमान कार्य विस्तार का उल्लेख करते हुए हरिश्चंद्र ने कहा कि आज देशभर में 83 हजार से अधिक शाखाएं नियमित रूप से संचालित हो रही हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता और जनकल्याण से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में 1.77 लाख से अधिक सेवा परियोजनाएं चल रही हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष संघ के विभिन्न प्रशिक्षण वर्गों में 21 हजार से अधिक शिक्षार्थी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, जो संगठन के बढ़ते विस्तार और सामाजिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

उन्होंने संघ की कार्यपद्धति और संगठनात्मक संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ ने कभी अपने संगठन के नाम का जयघोष नहीं किया। संघ की परंपरा में सदैव ‘भारत माता की जय’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यह इस भावना का प्रतीक है कि संगठन स्वयं को राष्ट्र और समाज से ऊपर नहीं मानता, बल्कि राष्ट्रहित की पूर्ति का एक माध्यम समझता है।

हरिश्चंद्र ने कहा कि संघ अपने कार्यों का श्रेय लेने में विश्वास नहीं करता। समाज की सज्जन, जागरूक और राष्ट्रनिष्ठ शक्तियों के सहयोग से ही सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है। इसलिए किसी भी उपलब्धि का वास्तविक श्रेय समाज को ही मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई संगठन स्वयं को केंद्र में रखकर श्रेय लेने लगे, तो वह अपनी मूल विचारधारा और कार्यसंस्कृति से भटक सकता है। समाज की जागृत और संगठित शक्ति ही संघ की वास्तविक उपलब्धि और प्रतिष्ठा है।

उन्होंने स्वयंसेवकों से सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान करते हुए कहा कि जब कोई कार्य पूर्ण निष्ठा, एकाग्रता और समर्पण भाव से किया जाता है, तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है। स्वयंसेवकों को समाज में सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बनकर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय योगदान देना चाहिए।

समारोह की मुख्य अतिथि डॉ. शैलजा गुप्ता ने अपने संबोधन में संघ शिक्षा वर्ग की अनुशासित कार्यशैली और प्रशिक्षण पद्धति की सराहना की। उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके कार्यकर्ताओं के चरित्र, अनुशासन, समयपालन और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण में निहित होती है। यदि व्यक्ति समय का सदुपयोग करना सीख ले और अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करे, तो वह व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने कहा कि संगठनबद्धता, सामूहिकता और एकात्मता की भावना किसी भी राष्ट्र और समाज को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक है। डॉ. गुप्ता ने संघ के घोष (बैंड) की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि यह केवल संगीत का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, सामूहिक समन्वय, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। घोष के माध्यम से स्वयंसेवकों में एकरूपता, टीम भावना और कर्तव्यनिष्ठा का विकास होता है।

कार्यक्रम में दिल्ली प्रांत के संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल, वर्ग के सर्वाधिकारी डॉ. शशांक तथा संघ के अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता और शिक्षार्थी उपस्थित रहे।

उल्लेखनीय है कि संघ शिक्षा वर्ग की परंपरा वर्ष 1927 में प्रारंभ हुई थी। प्रारंभ में इसे ‘अधिकारी शिक्षा वर्ग’ कहा जाता था, जिसे वर्ष 1950 में ‘संघ शिक्षा वर्ग’ नाम दिया गया। वर्ष 2024 से इसके प्रारूप में परिवर्तन करते हुए प्रशिक्षण अवधि को 15 दिनों का किया गया है। वर्ग के दौरान शिक्षार्थियों को सामूहिक जीवन, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक समरसता और संगठनात्मक कार्यपद्धति का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे समाज जीवन में सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभा सकें।---------------

हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

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