मप्र की दो विभूतियों को राष्ट्रपति ने प्रदान किए पद्मश्री सम्मान, मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दी बधाई

23 Jun 2026 23:13:53
मोहन नागर को पद्मश्री सम्मान प्रदान करते हुए करते हुए राष्ट्रपति


भगवान दास रायकवार को मरणोपरांत मिला पद्मश्री सम्मान उनके पुत्र को प्रदान करते हुए करते हुए राष्ट्रपति


भगवान दास रायकवार को मरणोपरांत मिला पद्मश्री सम्मान


- मोहन नागर और स्व. भगवानदास रायकवार के योगदान ने मप्र को किया गौरवान्वित: मुख्यमंत्री

भोपाल, 23 जून (हि.स.)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मंगलवार को नई दिल्ली में मध्य प्रदेश की दो विभूतियों को ‘पद्मश्री’ सम्मान से सम्मानित किया। इनमें मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर को समाज सेवा के क्षेत्र में और सागर के स्व. भगवानदास रायकवार को खेल और बुंदेली मार्शल आर्ट के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित होने पर दोनों विभूतियों को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि समाज सेवा और खेल जगत में दोनों विभूतियों के उल्लेखनीय योगदान ने न केवल मध्य प्रदेश को गौरवान्वित किया है बल्कि समाज और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी प्रस्तुत किया है।

उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश से इस वर्ष (2026) कुल चार हस्तियों का पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए चयन किया गया था। इनमें भोपाल के लेखक कैलाश चंद्र पंत, मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर, सागर के मार्शल आर्ट कलाकार भगवानदास रायकवार और उज्जैन के नारायण व्यास शामिल हैं।

भारत सरकार द्वारा 25 जनवरी 2026 को पुरस्कारों की घोषणा की गई थी। वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कार प्रदान करने का समारोह नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में दो चरणों में आयोजित किया गया। पहला चरण 25 मई 2026 को संपन्न हुआ। इस वर्ष कुल 131 पद्म पुरस्कारों की घोषणा की गई। मध्य प्रदेश की दो विभूतियां- भोपाल के लेखक कैलाश चंद्र पंत (साहित्य और शिक्षा क्षेत्र) और डॉ नारायण व्यास (पुरातत्व क्षेत्र) प्रथम चरण में गत माह सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं।

मंगलवार को नई दिल्ली में हुए समारोह के द्वितीय चरण में कुल 65 हस्तियों को सम्मानित किया गया। इसमें मध्य प्रदेश की दो विभूतियां शामिल हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मोहन नागर ने सम्मान प्राप्त किया। इसके साथ ही गत 18 अप्रैल को दिवंगत हुए भगवान दास रायकवार को मरणोपरांत सम्मान दिया गया, जो उनके पुत्र राजकुमार रैकवार ने ग्रहण किया।

मोहन नागर मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण और शैक्षिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने जल संचयन, नदी पुनरुद्धार, स्थाई ऊर्जा और शैक्षणिक प्रेरणा को जन-आंदोलन में बदल दिया। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के दौरान उन्होंने सतपुड़ा इको-क्षेत्र में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से 75 पहाड़ियों पर 75,000 जल संरचनाओं का निर्माण किया और सतत विकास के प्रतीक के रूप में हजारों पेड़ लगाए। उनके प्रयास से नदियों, जंगलों और पहाड़ियों के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी वाली संस्कृति को बढ़ावा मिला है।

राजगढ़ छोटे से गांव रायपुरिया में 23 फरवरी 1968 को जन्मे मोहन नागर ने विक्रम यूनिवर्सिटी, उज्जैन से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। वर्तमान में वे बैतूल स्थित भारत भारती आवासीय विद्यालय परिसर में निवासरत हैं। उन्होंने विशेष रूप से बैतूल जिले की सोना घाटी में वर्षाजल संचयन और जल संरचनाओं के निर्माण के माध्यम से प्राकृतिक जल चक्र को पुनर्जीवित करने का कार्य किया। सूखते जल स्रोतों, गिरते भू-जल स्तर और जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों में उनके प्रयासों ने जल उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ खेती और आजीविका को भी संबल दिया है।

उनके कार्यों का प्रभाव यह रहा कि स्थानीय स्तर पर लोग स्वयं जल संरक्षण की पहल से जुड़ने लगे। नागर द्वारा प्रारंभ किया गया ‘गंगा अवतरण अभियान’ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक जनआंदोलन के रूप में उभरा है। इस अभियान के माध्यम से उन्होंने स्थानीय समुदायों को जोड़ते हुए वैज्ञानिक और पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों को साझा किया। जल संरचनाओं का निर्माण, तालाबों और नालों का पुनर्जीवन, वर्षाजल संग्रहण और जनजागरूकता इस अभियान के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। जल संरक्षण के साथ-साथ मोहन नागर ने जैविक कृषि, गो-संरक्षण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किए हैं।

भगवानदास रायकवार को मरणोपरांत खेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। रायकवार पारंपरिक बुंदेली मार्शल आर्ट्स और लोक कलाओं के संरक्षक तथा गुरु के रूप में व्यापक रूप से सम्मानित थे। उन्होंने बुंदेलखंड क्षेत्र में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही पारंपरिक बुंदेली अखाड़ा मार्शल-आर्ट प्रणाली के पुनरुद्धार और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2 जनवरी 1944 को जन्मे भगवानदास रायकवार बुंदेलखंड की उस समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिसमें लोक जीवन, शौर्य, कला और साधना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने अखाड़ा संस्कृति, पारंपरिक युद्ध कला, लोक नृत्य, वाद्य और शस्त्र विद्या को न केवल संरक्षित किया, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी सतत प्रयास किया। लाठी, भाला, तलवार, ढाल, त्रिशूल, फरसा और कबड्डी जैसी पारंपरिक युद्ध कलाओं के प्रशिक्षण के साथ उन्होंने बुंदेली लोक परंपराओं को जीवित रखा।

रायकवार का जीवन संघर्ष, साधना और सेवा की मिसाल है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने श्री छत्रसाल व्यायामशाला परिसर को सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। यहां उन्होंने युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ अनुशासन, संस्कृति और इतिहास से जोड़ने का कार्य किया। उनके लिए कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-दर्शन है। वे देश-प्रदेश के अनेक लोक उत्सवों, सांस्कृतिक महोत्सवों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बुंदेली लोक कला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। महाकुंभ, लोक रंग, राष्ट्रीय नाट्य समारोह, सांस्कृतिक मेले और राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बुंदेलखंड की वीर परंपरा से रूबरू कराया। उनके प्रयासों से कई विलुप्तप्राय लोक कलाएं पुनर्जीवित हुईं और स्थानीय कलाकारों को नई पहचान मिली।

भगवानदास रायकवार ने 16 साल की उम्र में परिवार और गुरु के कहने पर अखाड़ा खेलना शुरू किया था। फिर इसे ही आत्मा बना लिया। वह सागर में ही सरकारी बैंक में नौकरी करते थे। अखाड़े का प्रशिक्षण देने के लिए उन्हें अकसर दूसरे राज्यों में जाना पड़ता था। समय कम पड़ने पर उन्होंने 1998 में बैंक की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरा समय अखाड़े को ही देने लगे। बेटे राजकुमार रायकवार ने बताया कि पिताजी के शिष्य पूरे देश में फैले हैं। उनकी एक शैली थी-बंदिश। इसमें वे रस्सी, तार की तरह किसी भी व्यक्ति को लट्ठ से बांध देते थे। वह तब तक नहीं छूट पाता था, तब तक वह स्वयं न खोलें।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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