
नई दिल्ली, 26 जून (हि.स.)। आपातकाल के पहले मीसा बंदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं वर्तमान में आईजीएनसीए के अध्यक्ष पद्म भूषण राम बहादुर राय ने शुक्रवार को कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जीतने की उम्मीद में कार्यकाल पूरा होने से 15 महीने पहले ही चुनावों की घोषणा कर दी। यही भ्रम अंततः उनकी हार और देश में लोकतंत्र की बहाली का माध्यम बना था।
राम बहादुर राय आज दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(आईजीएनसीए) में 'प्रज्ञा जिज्ञासा' ट्रस्ट की ओर से आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर आयोजित संवाद: इमरजेंसी के सबक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर आपातकाल: आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। यह आपातकाल के दौर के कई अनसुने पहलुओं को सामने लाती है। इसके लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अजय सेतिया हैं।
राय ने कहा कि इंदिरा गांधी ने संविधान में कई मनमाने संशोधन किए और लोकसभा का कार्यकाल दो बार बढ़ाया, लेकिन वे संघ और विपक्ष की चौतरफा घेरेबंदी को भांप नहीं सकीं। इंटेलिजेंस इनपुट के इस भ्रम में कि वे चुनाव जीत जाएंगी, उन्होंने कार्यकाल पूरा होने से 15 महीने पहले ही चुनावों की घोषणा कर दी। यही भ्रम अंततः उनकी हार और देश में लोकतंत्र की बहाली का माध्यम बना।
उन्होंने बताया कि भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे काले पन्नों में दर्ज 1975 के 'आपातकाल' को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य और अनसुने घटनाक्रम सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह 12 जून 1975 को घटी तीन बड़ी घटनाओं ने देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया और कैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भूमिगत रहकर इस तानाशाही के खिलाफ मोर्चा संभाला।
राय ने बताया कि 12 जून 1975 का दिन इंदिरा गांधी सरकार के लिए सबसे बड़ा अपशकुन साबित हुआ था। उस दिन तीन मुख्य घटनाएं घटीं। इनमें सुबह 06:00 बजे इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकार डी.पी. धर ने अंतिम सांस ली। सुबह 10:00 बजे: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग (यशपाल कपूर को चुनाव एजेंट बनाने) के आरोप में इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया और शाम 04:00 बजे: गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आए, जिसमें इंदिरा गांधी के सघन प्रचार के बावजूद कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।
इस अदालती फैसले के बाद दिल्ली के गोलमेथी चौक पर इंदिरा गांधी के समर्थन में और न्यायपालिका पर दबाव बनाने के लिए भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी।
राय ने बताया कि उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अधिवक्ता नानी पालकीवाला ने उच्चतम न्यायालय के वेकेशन जज जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर की अदालत में याचिका दायर की। 24 जून को कोर्ट ने एक बीच का रास्ता निकाला, जिसके तहत इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर तो बनी रह सकती थीं लेकिन उन्हें संसद में मतदान करने का अधिकार नहीं था। इसके ठीक अगले दिन, 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण (जेपी) की ऐतिहासिक रैली हुई और उसी रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।
उन्होंने खुलासा करते हुए कहा कि इस आपातकाल को लगाने के पीछे इंदिरा गांधी के तीन स्पष्ट और मुख्य उद्देश्य थे। प्रधानमंत्री पद पर बने रहना, अदालती लड़ाई जीतना (इसके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर 38वां, 39वां और 40वां संविधान संशोधन पास कराया गया, ताकि प्रधानमंत्री के चुनाव को अदालत के दायरे से बाहर किया जा सके।) और विपक्षी नेताओं तथा असहमति की आवाज़ों को जेल में डालकर पूरी तरह निष्प्रभावी कर देना।
उनके अनुसार, जब 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगाया गया, तो संघ ने अपनी पुरानी रणनीतियों का इस्तेमाल किया। प्रतिबंध से पहले ही सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने आंदोलन की कमान माधवराव मुले को सौंप दी थी।
उन्होंने बताया कि संघ ने सीधा अपने नाम से काम करने के बजाय 'लोक संघर्ष समिति' के बैनर तले देशव्यापी भूमिगत आंदोलन शुरू किया। पूरे देश को 6 हिस्सों में बांटा गया, जिसमें रज्जू भैया को राजनीतिक दलों से संपर्क और दत्तोपंत ठेंगड़ी को जन आंदोलनों की ज़िम्मेदारी दी गई। सरकारी दावों के विपरीत, संघ के 1100 से अधिक प्रचारकों में से केवल 117 ही गिरफ्तार हो सके, जबकि बाकी ने भूमिगत रहकर इंदिरा गांधी की खुफिया एजेंसियों को छकाए रखा।
राय ने कहा कि आपातकाल के दौरान विपक्ष में वैचारिक मतभेद भी गहरे थे। जहां एक ओर जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में 'डायनामाइट' जैसी क्रांतिकारी धारा चल रही थी (जिसे जनसंघ नेता वीरेन जे. शाह ने वित्तीय मदद दी थी)। इसी बीच इंदिरा गांधी ने दोहरा मापदंड अपनाते हुए वीरेन शाह को जेल भेजा लेकिन चिमनभाई पटेल के खिलाफ जांच बंद करवा दी।
इस पूरे आंदोलन में जयप्रकाश नारायण (जेपी) की भूमिका 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गांधी जैसी रही। उन्होंने आरएसएस, समाजवादियों और यहाँ तक कि नक्सलियों जैसी विपरीत विचारधाराओं को एक मंच पर ला खड़ा किया। लालकृष्ण आडवाणी और ओमप्रकाश त्यागी ने इस नेतृत्व को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
उन्होंने बताया कि नवंबर 1975 में ही संघ नेतृत्व और जेपी को यह भनक लग गई थी कि इंदिरा गांधी भ्रम में आकर जल्द ही चुनाव करा सकती हैं। 'इकोनॉमिक टाइम्स' के तत्कालीन संपादक हिरण्मय कारलेकर, जो इंदिरा गांधी के दौरों पर साथ रहते थे, उन्होंने इसकी जानकारी रामनाथ गोयनका के माध्यम से विपक्ष तक पहुंचाई थी। इसके बाद, संघ के वरिष्ठ नेता भाऊराव देवरस ने नवंबर में ही उत्तर प्रदेश में जनसंघ के नेताओं को 40 चुनावी सीटें चुनने के निर्देश दे दिए थे। वहीं, जेल से आने के बाद जेपी ने भी स्पष्ट संदेश दिया कि अब एकमात्र लक्ष्य सभी लोकतांत्रिक विपक्षी दलों को एक करना होना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी