नई दिल्ली, 30 जून (हि.स.)। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं की रोकथाम के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) ने मई 2025 से अब तक 10 राज्यों के 30 उच्च शिक्षण संस्थानों का दौरा किया है। कार्यबल ने 25 हितधारक परामर्श भी आयोजित किए हैं, जिनमें जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, दिव्यांग छात्रों की समस्याएं, एसटी एवं ओबीसी छात्रों के मुद्दे, मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
शिक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि इन दौरों और परामर्शों का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों और संस्थानों की वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए छात्र मानसिक स्वास्थ्य के लिए समावेशी और बहु-विषयक नीति तैयार करना है।
मंत्रालय के अनुसार अंतरिम रिपोर्ट और अब तक के अध्ययन में कई गंभीर चुनौतियां सामने आई हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र आत्महत्याओं के पीछे केवल मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं ही नहीं, बल्कि शैक्षणिक दबाव, जातिगत एवं लैंगिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयां, सामाजिक अलगाव, पारिवारिक अपेक्षाएं, पर्याप्त संस्थागत सहयोग का अभाव तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। सर्वेक्षण में शामिल 70 प्रतिशत से अधिक संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता नहीं मिले। 20 प्रतिशत से भी कम संस्थानों का मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से औपचारिक समन्वय था, जबकि चार प्रतिशत से भी कम संस्थानों में आत्महत्या के जोखिम से निपटने के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल मौजूद थे। लगभग 45 प्रतिशत संस्थानों ने पिछले 18 महीनों में शिक्षकों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण भी आयोजित नहीं किया।
रिपोर्ट के अनुसार 2.43 लाख से अधिक छात्रों के सर्वेक्षण में लगभग 34 प्रतिशत छात्रों ने स्वयं को परिसर में अलग-थलग महसूस करने की बात कही, जबकि 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में लंबे समय तक अत्यधिक तनाव, अवसाद या चिंता का अनुभव होने की जानकारी दी। वहीं, नौ प्रतिशत छात्रों ने पिछले एक वर्ष के दौरान अक्सर आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकार की।
कार्यबल के संस्थागत दौरों में छात्रों ने कठोर उपस्थिति नियम, अत्यधिक शैक्षणिक दबाव, शिक्षकों की कमी, छात्रवृत्ति में देरी, शिकायत निवारण तंत्र की निष्क्रियता, जातिगत एवं लैंगिक भेदभाव, छात्रावासों की खराब स्थिति और अपर्याप्त काउंसलिंग सेवाओं जैसी समस्याएं प्रमुख रूप से उठाईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई संस्थानों में छात्र शिकायत तंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह गया है और छात्रों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर हुआ है।
रिपोर्ट में अंतरिम सिफारिशें भी की गई हैं। इनमें छात्र आत्महत्या से जुड़े आंकड़ों के लिए एक अधिक विश्वसनीय और समन्वित राष्ट्रीय डाटा प्रणाली विकसित करने, प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में प्रभावी एवं पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य सहायता व्यवस्था सुनिश्चित करने, प्रशिक्षित काउंसलर नियुक्त करने, आत्महत्या के जोखिम से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने तथा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील बनाने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में शिकायत निवारण तंत्र को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और छात्र-अनुकूल बनाने, भेदभाव रोकने के लिए संस्थागत जवाबदेही बढ़ाने तथा छात्रों को अपनी समस्याएं सुरक्षित माहौल में रखने के लिए अधिक मंच उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है। साथ ही छात्र-शिक्षक संवाद मजबूत करने, मेंटरशिप व्यवस्था को सुदृढ़ करने, विविधता एवं समावेशन को बढ़ावा देने तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को संस्थागत संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाने की भी सिफारिश की गई है।
उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने 24 मार्च 2025 को उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता में राष्ट्रीय कार्यबल का गठन किया था। कार्यबल का दायित्व छात्र आत्महत्याओं के प्रमुख कारणों की पहचान करना, मौजूदा कानूनों और संस्थागत व्यवस्थाओं की समीक्षा करना तथा प्रभावी रोकथाम और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सुधारों की सिफारिश करना है। न्यायालय ने 27 मई 2026 के आदेश में कार्यबल को अपनी अंतिम रिपोर्ट 31 अक्टूबर 2026 तक सौंपने का समय दिया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार