
नागपुर, 03 जुलाई (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि समाज में विभिन्न क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक कार्य करते हैं। नतीजतन लोगों को लगता है कि सबकुछ संघ द्वारा सेंट्रली या रिमोट से संचालित होता है, लेकिन यह गलत धारणा है। संघ ऐसा कुछ नहीं करता। संघ का कार्य केवल संगठन चलाना नहीं बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है, जो अपने आचरण से समाज का मार्गदर्शन कर सकें। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक का पहला गुण केवल सक्रिय कार्यकर्ता बनना नहीं बल्कि संघ के विचारों के अनुरूप जीवन जीना है।
नागपुर के साइंटिफिक सभागार में डॉ. हेडगेवार : आधुनिक युग के शालिवाहन विषय पर आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख डॉ. भागवत ने कहा कि कार्य का स्वरूप समय के साथ बदल सकता है, लेकिन उसका मूल तत्व कभी नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिद्धांत केवल पुस्तकों में पढ़ने या भाषणों में सुनने की चीज नहीं हैं बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समाज में स्वयंसेवकों की भागीदारी से चलने वाली सभी गतिविधियों का संचालन संघ केंद्रीय रूप से नहीं करता। संघ का उद्देश्य समाज की आवश्यकता के अनुरूप चरित्रवान और संस्कारित व्यक्तियों का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि संघ की शाखाएं विचारों की प्रयोगशाला हैं, जहां ऐसे व्यक्तित्व तैयार होते हैं जिनका प्रभाव उनके परिवार और समाज में दिखाई देता है।
डॉ. भागवत ने कहा कि स्वयंसेवक का जीवन पूर्णता की साधना है और यह साधना जीवनभर चलती है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को विश्व का मार्गदर्शक बनना है, तो भारतीयों और उनके परिवारों को ऐसा जीवन जीना होगा, जिससे दुनिया स्वयं प्रेरणा ले सके। उन्होंने बताया कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भी अपने पूरे जीवन में निरंतर आत्मसाधना की और अपने आचरण से आदर्श प्रस्तुत किया।
सरसंघचालक ने कहा कि डॉ. हेडगेवार के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनका पूर्ण समर्पण था। उन्होंने तन, मन और धन के साथ-साथ अपने स्वभाव तक का त्याग किया। डॉ. भागवत ने कहा कि अपने स्वभाव और अहंकार का त्याग करना सबसे कठिन होता है। उन्होंने आगाह किया कि समर्पण के मार्ग पर आगे बढ़ते समय 'मैं समर्पित हूं' का अहंकार भी नहीं आना चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद भी देश में पश्चिमी जीवन शैली का अनुकरण करने की प्रवृत्ति रही, लेकिन डॉ. हेडगेवार ने अपने जीवन से भारतीय जीवन मूल्यों का आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि दुनिया को जिस प्रकार का जीवन देना है, उसे पहले स्वयं अपनाना आवश्यक है।
डॉ. भागवत ने कहा कि आज देश-विदेश के अनेक लोग अपने युवाओं के प्रशिक्षण के लिए संघ से प्रेरणा लेने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज परिवर्तन का कार्य निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। कोई तेज गति से आगे बढ़ता है तो कोई धीरे-धीरे, लेकिन सभी का लक्ष्य धर्म, संस्कृति और राष्ट्र जीवन की रक्षा होना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी