

वाराणसी, 06 जुलाई (हि.स.)। बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक सोच, नैतिक मूल्यों, चरित्र निर्माण और जिम्मेदार नागरिकता का विकास भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध, नवाचार, अंतर्विषयक अध्ययन और उद्योगों के साथ सहयोग को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
राज्यपाल हसनैन सोमवार को उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के यूनेस्को चेयर फॉर पीस एंड इंटरकल्चरल अंडरस्टैंडिंग तथा मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इक्कीसवीं सदी के लिए शैक्षिक सुधार: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विरासत के आलोक में शिक्षा की पुनर्कल्पना विषयक सम्मेलन का आयोजन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 125वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में किया गया है। सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि बिहार के राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षण संस्थानों के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करने वाले रणनीतिक संस्थानों के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि 'विकसित भारत-2047' के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शैक्षिक सुधारों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाना आवश्यक है।
उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और भ्रामक सूचनाओं जैसी उभरती वैश्विक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों को बदलते समय की इन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए तैयार करें।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि यूनेस्को महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन फॉर पीस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक प्रो. ओबिजियोफोर अगिनम ने शिक्षा को समाज की साझा जिम्मेदारी बताते हुए करुणा, सहानुभूति और मानवीय मूल्यों पर आधारित विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया। शिक्षा के लिए यूनेस्को की न्यू सोशल कॉन्ट्रैक्ट की अवधारणा का उल्लेख भी किया।
बीएचयू कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि तीव्र तकनीकी विकास, इंटरनेट की व्यापक पहुंच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में उच्च शिक्षा के स्वरूप में तेजी से बदलाव हो रहा है। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों को अपनी शिक्षण पद्धति, कक्षा संचालन, परीक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम की पुनर्समीक्षा करनी होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य आज भी वही है, लेकिन उसे प्राप्त करने के तरीके समय के अनुरूप बदलने चाहिए। उन्होंने अधिक संवादात्मक, सहभागितापूर्ण और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण व्यवस्था विकसित करने पर बल दिया।
सम्मेलन के प्रारंभ में मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च के समन्वयक प्रो. मनोज कुमार मिश्र ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रेरणा लेकर इक्कीसवीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षिक सुधारों पर गंभीर विमर्श करना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सम्मेलन से शिक्षा व्यवस्था को शांति, संवाद, समावेशिता और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों के आधार पर सशक्त बनाने के लिए ठोस सुझाव सामने आएंगे।
उद्घाटन सत्र में बीएचयू के यूनेस्को चेयर धारक प्रो. प्रियंकर उपाध्याय, सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन एवं राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. अशोक कुमार उपाध्याय सहित देशभर से आए शिक्षाविद्, नीति-निर्माता, शोधार्थी, शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी