‘नेत्रदान’ के बजाय ‘नेत्रदान संकल्प पखवाड़ा’ कहना अधिक उचित होगा : भैय्याजी जोशी

25 Aug 2026 19:48:53
भैय्याजी जोशी


अरिवंद मार्डीकर आणि अविनाश अग्निहोत्री सामंजस्य करारावर हस्ताक्षर करताना


- राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े का माधव नेत्रालय में शुभारंभ, बालाघाट के कारंजा में नेत्रसेवा के लिए माधव नेत्रालय की पहल

नागपुर, 25 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश उपाख्य भैय्याजी जोशी ने कहा कि ‘नेत्रदान’ के बजाय ‘नेत्रसंकल्प’ या किसी और वैकल्पिक शब्द पर विचार होना चाहिए। उन्होंने बताया कि ‘नेत्रदान पखवाड़े’ के बजाय ‘नेत्रदान संकल्प पखवाड़ा’ कहना अधिक उचित होगा।

नागपुर स्थित माधव नेत्रालय मे आयोजित नेत्रदान पखवाडे के शुभारंभ के अवसर पर भैय्याजी जोशी ने कहा कि हम स्वयं अर्जित धन, प्राप्त ज्ञान अथवा अपनी किसी वस्तु का दान कर सकते हैं। लेकिन आंखें अथवा शरीर के अंग परमेश्वर द्वारा हमें दिए गए हैं। ऐसे में मृत्यु के बाद किसी व्यक्ति को नेत्रज्योति अथवा अंग उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को ‘दान’ कहना कितना उचित है, इस पर विचार होना आवश्यक है।

इस कार्क्रम में नागपुर एम्स के निदेशक डॉ. प्रशांत जोशी, पिक्स ट्रांसमिशन लिमिटेड के निदेशक जो. पॉल, माधव नेत्रालय के उपाध्यक्ष निखिल मुंडले, सचिव अविनाश अग्निहोत्री, मेजर बाम, भाऊसाहेब देवरस सेवा न्यास, कारंजा के सचिव तथा हिंदुस्थान समाचार के अध्यक्ष अरविंद मार्डीकर प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

भैय्याजी जोशी ने कहा कि भाषा के व्यवहार में कई बार गलत शब्द प्रचलित हो जाते हैं। किसी व्यक्ति में शारीरिक कमी हो तो उसे ‘पंगु’ कहा जाता है, जबकि पंगुत्व से रहित व्यक्ति के लिए ‘अपंग’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। संत तुकाराम महाराज के अभंग में भी ‘ज्यासि अपंगिता नाही। त्यासि धरी जो हृदयीं।’ का उल्लेख मिलता है। हालांकि व्यवहार में शारीरीक कमी अथवा अपाहिज व्यक्तियों को ‘अपंग’ कहा जाता है। इसलिए ‘दिव्यांग’ शब्द का वैकल्पिक रूप से प्रचलित होना स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि इसी आधार पर ‘नेत्रदान’ शब्द पर भी विचार करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि स्वयं अर्जित वस्तु, धन अथवा विद्या दूसरों को देने को ‘दान’ कहना उचित है। लेकिन आंखें अथवा शरीर के अंग हमने स्वयं अर्जित नहीं किए हैं, बल्कि वे जन्म से ही परमेश्वर द्वारा दिए गए हैं। इसलिए किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी पूर्व इच्छा के अनुसार परिजन यदि उसके नेत्र अथवा अंग किसी जरूरतमंद व्यक्ति को उपलब्ध कराते हैं, तो उसे ‘दान’ कहना कितना उचित है, यह प्रश्न विचारणीय है।

नेत्रदान के संबंध में समाज में जनजागृति करने के साथ ही इसके पीछे की अवधारणा के लिए उचित शब्द का होना भी आवश्यक है। इस पृष्ठभूमि में ‘नेत्रदान’ के लिए वैकल्पिक शब्द खोजा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि इस अवधि में वास्तव में नेत्रदान नहीं होता, बल्कि नागरिक नेत्रदान का संकल्प लेते हैं।

कारंजा में अत्याधुनिक नेत्रसेवा उपलब्ध होगी

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले की लांजी तहसील स्थित कारंजा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस का पैतृक गांव है। यहां वर्तमान में बालासाहेब भाऊराव देवरस सेवा न्यास कार्यरत है। क्षेत्र में विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद नेत्ररोगों की जांच और उपचार के लिए अपेक्षित सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसी कारण माधव नेत्रालय ने यह पहल की है। इसके तहत अत्याधुनिक उपकरणों के माध्यम से कारंजा और आसपास के नागरिकों के लिए नेत्र जांच तथा नेत्र चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस उद्देश्य से माधव नेत्रालय और बालासाहेब भाऊराव देवरस सेवा न्यास के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया गया।

इस समझौते पर माधव नेत्रालय की ओर से अविनाश अग्निहोत्री और बालासाहेब भाऊराव देवरस सेवा न्यास की ओर से अरविंद मार्डीकर ने हस्ताक्षर किए। इस पहल से कारंजा और आसपास के नागरिकों को स्थानीय स्तर पर अत्याधुनिक नेत्रसेवा उपलब्ध होने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

-------------------

हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी

Powered By Sangraha 9.0