विविधता में एकता के संदेश को दुनिया तक पहुंचाने को अपना कर्तव्य मानता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : मोहन भागवत

30 Aug 2026 00:00:53
Sarsangachalak Mohan Bhagwat


नई दिल्ली, 29 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आज कहा कि दुनिया में विविधता को सुरक्षित रखना जरूरी है, क्योंकि विविधता प्रकृति का नियम है और एकता उसके पीछे का सत्य है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि जो हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू नहीं है। हर मनुष्य का समान सम्मान है और उसकी आस्था एक मार्ग है। यह सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।

‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि सत्य एक है, लेकिन मनुष्य उसे अलग-अलग प्रकार से देखते हैं। इसी सत्य को पाने के लिए अलग-अलग रास्ते हैं, लेकिन लक्ष्य एक है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य की अपनी गरिमा है और मनुष्यों के बीच सम्मान के स्तर पर कोई अंतर नहीं है।

भागवत ने कहा कि संघ का मानना है कि भारत का मानवता के एक होने का ज्ञान दुनिया तक पहुंचाना जरूरी है। लोगों को बताना चाहिए कि विविधता के बावजूद हम एक हैं।

संघ को लेकर चलाए जा रहे नैरेटिव को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि संघ समाज को परिवर्तन का माध्यम मानता है और मानवता की समान दृष्टि के साथ सेवा करने का पक्षधर है। हालांकि निःस्वार्थ सेवा के चलते आरएसएस प्रचार के मामले में पीछे रहा है और इसी कारण कई तरह की धारणाएं और कथानक बनाए गए हैं।

उन्होंने कहा कि सभी धर्म में समान रूप से एकता का संदेश दिया गया है लेकिन मनुष्य अपने दिमाग में बने ‘सॉफ्टवेयर’ का गुलाम है। ऐसे में जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि एकता का यह ज्ञान बना रहे। उन्होंने आकाश से गिरने वाले जल का उदाहरण देते हुए कहा कि वह अंततः सागर की ओर जाता है।

भागवत ने कहा कि भारत के महान नेताओं ने हमेशा एकता की बात कही। आजादी के बाद बनाए गए संविधान में भी इसे शामिल किया गया। हालांकि उन्होंने इस बात पर सवाल उठाने की राजनीति के जरिए इस एकता के भाव को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज राजनीति स्वयं का हित साधने का मार्ग बन गई है। इसलिए संघ समाज परिवर्तन पर जोर देता रहा है।

उन्होंने कहा कि 2018 में दिए उनके वक्तव्य के बाद कई लोगों ने उन्हें संवाद के लिए आमंत्रित किया। इनमें मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोग भी शामिल थे। संघ का दृष्टिकोण संवाद और सेवा का है। सेवा समान भाव से की जाती है और किसी प्रचार या बदले में कुछ पाने की अपेक्षा से नहीं। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद विभिन्न देशों और मतों के नेताओं से समाज और स्थानीय स्तर पर कार्य शुरू करने पर जोर दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा

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