कर्नाटक के गांव से एशियाई खेलों तक का सफर : सेना में मिली निशानेबाजी ने बदली केदारलिंग की जिंदगी

31 Aug 2026 18:41:53
केदारलिंग बालकृष्ण उचागनवे


नई दिल्ली, 31 अगस्त (हि.स.)। कर्नाटक के एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय सेना में भर्ती होने वाले केदारलिंग बालकृष्ण उचागनवे ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। वर्ष 2018 में सेना में शामिल होने वाले 27 वर्षीय नायब सूबेदार केदारलिंग अब आगामी एशियाई खेलों में भारतीय निशानेबाजी टीम का हिस्सा बनने जा रहे हैं। हालांकि, उनकी नजर इससे भी बड़े लक्ष्य पर है—लॉस एंजिल्स ओलंपिक में पदक जीतना।

कृषि पर निर्भर परिवार से आने वाले केदारलिंग के माता-पिता आज भी खेती करते हैं। संयुक्त परिवार में पले-बढ़े केदारलिंग ने बचपन में जिला स्तर पर 1500 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया था, लेकिन तब उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि खेल के जरिए अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाएंगे।

निशानेबाजी से उनका परिचय भी लगभग संयोग से हुआ। सेना में भर्ती होने के बाद उन्हें पता चला कि वहां शूटिंग रेंज है और प्रतिभाओं की पहचान की जा रही है। इसी प्रक्रिया में उनका चयन हुआ और उन्होंने पहली बार पिस्टल थामी।

केदारलिंग ने साई मीडिया से बातचीत में बताया, “सेना में शामिल होने से पहले मुझे निशानेबाजी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। स्कूल या कॉलेज के समय सामान्य ज्ञान में अभिनव बिंद्रा का नाम जरूर सुना था। 2018 में सेना में आने के बाद मुझे शूटिंग रेंज और प्रतिभा पहचान कार्यक्रम के बारे में पता चला। मेरा चयन हुआ और तभी मुझे वास्तव में निशानेबाजी के बारे में जानकारी मिली।”

शुरुआत में उन्हें इस खेल में करियर की संभावनाओं का अंदाजा नहीं था। घरेलू प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने, अनुभवी निशानेबाजों को देखने और प्रशिक्षण के दौरान मिले अनुभवों ने उनकी सोच बदल दी।

उन्होंने कहा, “शुरुआत में हमें इस खेल के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। हम सिर्फ बंदूक से अभ्यास करते थे। लेकिन जब हमें बाहर जाकर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने और शूटिंग से जुड़े वीडियो देखने का मौका मिला, तब समझ आया कि इसे करियर बनाया जा सकता है। हम नौकरी के साथ देश के लिए भी खेल सकते हैं। यहीं से मेरे अंदर इच्छा पैदा हुई।”

दौड़ के मुकाबले निशानेबाजी की अलग प्रकृति ने भी उन्हें आकर्षित किया। केदारलिंग के मुताबिक, इसमें बाहरी परिस्थितियों के बजाय खुद पर नियंत्रण, एकाग्रता और सटीकता महत्वपूर्ण होती है।

सेना उनके लिए सिर्फ नौकरी का माध्यम नहीं रही, बल्कि यहीं से उनके निशानेबाजी करियर को मजबूत आधार मिला। शुरुआती प्रशिक्षकों ने उन्हें खेल जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। सेना की टीम में जगह बनाने के बाद उन्हें प्रशिक्षकों के साथ-साथ खेल चिकित्सा विशेषज्ञों और पोषण विशेषज्ञों की सुविधाएं भी मिलीं।

सेना ने उन्हें शुरुआती दौर में पिस्टल भी उपलब्ध कराई। साझा हथियार से अभ्यास शुरू करने के बाद प्रदर्शन बेहतर होने पर उन्हें व्यक्तिगत पिस्टल दी गई। अब उनके पास सेना की ओर से मिली पिस्टल के अलावा एक अतिरिक्त पिस्टल भी है।

हालांकि, उनका सफर चुनौतियों से भी भरा रहा। खेती पर निर्भर परिवार के लिए निशानेबाजी में इस्तेमाल होने वाले उपकरण और गोलियों का खर्च एक बड़ी चिंता थी।

सेना, भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ, भारतीय खेल प्राधिकरण और प्रायोजक की मदद से उन्हें प्रशिक्षण शिविरों और प्रतियोगिताओं में जरूरी सुविधाएं मिलती रहीं।

केदारलिंग के लिए ध्यान भी तैयारी का अहम हिस्सा है। वह दिन की शुरुआत ध्यान और सांसों पर ध्यान केंद्रित करके करते हैं। उनका मानना है कि शांत रहना निशानेबाजी में बेहतर प्रदर्शन के लिए बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा, “सबसे पहले अगर हम शांत रहें तो सब कुछ ठीक रहेगा। ध्यान के दौरान मैं अपनी सांस और परिस्थिति पर ध्यान देता हूं, ताकि वर्तमान में रह सकूं। इससे मुझे काफी मदद मिलती है।”

प्रतियोगिता को लेकर उनका नजरिया भी बेहद सरल है। उनका लक्ष्य हर प्रतियोगिता में देश के लिए पदक जीतना है, लेकिन वह परिणाम के बजाय अपनी रणनीति और प्रशिक्षण पर ध्यान देते हैं।

केदारलिंग ने कहा, “हर प्रतियोगिता में मेरा लक्ष्य देश के लिए पदक जीतना है। हमारी रणनीति और प्रशिक्षण की दिनचर्या तय होती है। हमें बस उसे सही तरीके से लागू करना है। अगर हम अपनी दिनचर्या और प्रशिक्षण को सही तरीके से अमल में लाते हैं तो पदक अपने आप आएगा।”

एशियाई खेलों के लिए चयन को वह अपने करियर की सबसे खास उपलब्धि मानते हैं। उनके गांव में भी इस खबर को लेकर उत्साह है। केदारलिंग बताते हैं कि उनके परिवार को स्कोर और रैंकिंग की बारीकियों की भले ही पूरी जानकारी न हो, लेकिन उन्हें इस बात की खुशी है कि उनका बेटा विदेश जाकर भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रहा है।

उन्होंने कहा, “गांव से आने वाले व्यक्ति के लिए नौकरी हासिल करना और फिर किसी प्रतियोगिता के लिए विदेश जाने का अवसर मिलना बहुत बड़ी बात है। परिवार मुझे बस अच्छा प्रदर्शन करने, अपना ध्यान रखने और भगवान पर विश्वास रखने के लिए कहता है।”

केदारलिंग के गांव में अब कई लोग उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले निशानेबाज के तौर पर पहचानने लगे हैं। कुछ अभिभावकों ने उनसे यह भी कहा है कि उनके बच्चे भी उनके जैसा रास्ता अपनाना चाहते हैं।

इसके बावजूद केदारलिंग खुद पर किसी तरह का दबाव नहीं मानते। उनका कहना है कि उनका पूरा ध्यान वर्तमान में रहकर प्रशिक्षण के मुताबिक प्रदर्शन करने पर है।

उन्होंने कहा, “कोई दबाव नहीं है। अगर मैं अच्छा प्रदर्शन करूंगा तो देश, गांव और सेना का नाम अपने आप ऊंचा होगा। मेरा मुख्य ध्यान वर्तमान में रहकर वही करने पर है, जो मैंने सीखा और जिसके लिए प्रशिक्षण लिया है।”

उनका मंत्र भी धैर्य पर आधारित है—“धैर्य रखें। आपको जो चाहिए, वह समय आने पर मिलेगा। समय से आगे भागने की जरूरत नहीं है। जिस चीज के लिए मेहनत कर रहे हैं, वह आपको समय आने पर जरूर मिलेगी।”

2018 में पहली बार पिस्टल थामने से लेकर 2022 में सीनियर विश्व कप में हिस्सा लेने और अब एशियाई खेलों तक पहुंचने वाले केदारलिंग की यात्रा तेजी से आगे बढ़ी है। लेकिन वह एशियाई खेलों को मंजिल नहीं मानते।

केदारलिंग ने कहा, “मेरा मुख्य लक्ष्य ओलंपिक है। मैं लॉस एंजिल्स ओलंपिक में जाना चाहता हूं और वहां पदक जीतना चाहता हूं।”

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / सुनील दुबे

Powered By Sangraha 9.0