लोकतंत्र में आंदोलन का उद्देश्य सहमति होना चाहिए न कि विभाजन पैदा करना : मोहन भागवत

06 Aug 2026 21:27:53
प्रश्नों का उत्तर देते मोहन भागवत


नई दिल्ली, 06 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार को लोकतंत्र में संवाद के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आंदोलन भी इसी का एक भाग है। हालांकि मतभेद होने पर सबसे पहले बातचीत का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आंदोलन की आवश्यकता पड़ने पर उद्देश्य सर्वसम्मति बनाना होना चाहिए न की समाज में विभाजन पैदा करना।

संघ प्रमुख ने आज मुंबई में एक कार्यक्रम में देशभर से आए जेनजी और जेन अल्फा यानी 15 से 27 वर्ष के युवाओं और किशोरों के समक्ष हाल ही में हुए सीजेपी आंदोलन के बाद इस वर्ग के मन में उपजे प्रश्नों का उत्तर दिया। सरसंघचालक ने शिक्षा में सुधारों पर बल देते हुए केन्द्रीय बजट का 6 प्रतिशत आवंटित किए जाने का समर्थन किया। साथ ही कहा कि इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि शिक्षा से अगली पीढ़ी का निर्माण हो।

संघ प्रमुख ने भारतीय परंपरा में संवाद और शास्त्रार्थ की संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन संवाद का एक माध्यम है। विरोध प्रदर्शन जब सुना न जाए तो सर्वसम्मति बनाने का एक तरीका है। लेकिन इसका उद्देश्य सम्मति बनाना होना चाहिए न कि विभाजन पैदा करना। उन्होंने सहमति जताई कि देश की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

प्रश्नोत्तर की शैली में एक-एक कर मोहन भागवत ने आंदोलन, सोशल मीडिया, शिक्षा से जुड़े प्रश्नों का उत्तर दिया। साथ ही यह भी बताया कि संघ एलजीबीटीक्यू, समलैंगिक समाज, महिला नेतृत्व के विषय में क्या सोचता है। उन्होंने संमलैंगिक लोगों को समाज में समाहित करने पर विचार करने का पक्ष लिया और बताया कि संघ की शीर्ष निर्णायक इकाई प्रतिनिधि सभा में महिलाओं को निर्णयों में भागीदारी दी जाती है।

मुंबई स्थित नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में आज इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (आईआईएमयूएन) के 15वें जयंती कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें दो हजार से अधिक जेन-जी और जेन-अल्फा छात्रों ने भाग लिया। उन्होंने युवा पीढ़ी की प्रशंसा करते हुए कहा कि जेन-जी केवल आदेशों का पालन करने के बजाय हर बात के पीछे तर्क और कारण जानना चाहती है।

उनसे आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज और पैलेट गन का उपयोग किए जाने पर भी सवाल पूछा गया। संघ प्रमुख ने कहा कि क्यों और क्या हुआ इसकी उन्हें जानकारी नहीं है लेकिन अगर किसी की बात पर विश्वास करना है तो वे देश के युवाओं पर पहले विश्वास करेंगे।

मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार को सहयोग देने और जागरुक कराने के लिए समाज को अग्रिम भूमिका निभानी चाहिए। शिक्षा की बेहतरी के लिए शिक्षकों को सही प्रशिक्षण दिया जाना जरुरी है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को बजट का 06 प्रतिशत दिए जाने का समर्थन किया और यह भी कहा है कि हमें सुनिश्चित करना चाहिए की सरकार इसे ठीक से लागू कराए। यह काम बिना आंदोलन के भी हो जाएगा।

आरक्षण के मुद्दे पर सरसंघचालक ने कहा कि सामाजिक कारणों से इसकी आवश्यकता उत्पन्न हुई है। सामाजिक भेदभाव रहने तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

भागवत ने सोशल मीडिया के उपयोग के प्रश्न पर कहा कि इस पर जानकारी जिम्मेदारी के साथ साझा होनी चाहिए और लोगों को केवल प्रमाणिक स्रोतों पर भरोसा करना चाहिए। युवाओं को सकारात्मक, उपयोगी और समाजहित की सामग्री साझा करनी चाहिए। जेन-जी में भी यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही है और क्या नहीं। वरिष्ठ पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए। बच्चों को सही रोल मॉडल चुनने चाहिए।

चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ नागरिक संबंधों के प्रश्न पर भागवत ने कहा कि युद्ध के समय इस तरह के संबंधों में रोक लगानी होती है और बाद में फिर से संवाद का रास्ता ढूंढना चाहिए। उन्होंने मावनता के एक होने का संदेश दिया और यह भी स्पष्ट किया कि आतंक भी युद्ध का ही हिस्सा है।

एलजीबीटीक्यू और समलैंगिक विवाह के विषय पर संघ के सरसंघचालक ने कहा कि भारत में सबको समाहित करने की परंपरा रही है। यह समुदाय भी समाज का हिस्सा है। वहीं समलैंगिक विवाह के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि विवाह एक संस्थान और परंपरागत व्यवस्था है। हालांकि हमें समलैंगिक के साथ रहने के बारे में कोई कानूनी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसे समाज स्वीकार करे।

वहीं समाज में महिलाओं की भूमिका पर मोहन भागवत ने कहा कि महिला और पुरुष समान और पूरक है। महिलायें सब सकती हैं और उन्हें सभी कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। वहीं संघ में महिलाओं की भूमिका के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ जब बना था तब वैसी व्यवस्था थी और उसे देखते हुए समानांतर महिलाओं की अलग स्वायत्त राष्ट्र सेविका समिति बनी। संघ के बाकी सभी संगठनों में महिलाओं की भागीदारी है। वहीं वे संघ की शीर्ष निर्णायक इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में महिला प्रतिनिधि भी शामिल होती हैं और निर्णयों में उनकी भागीदारी होती है।

रोजगार के मुद्दे पर भागवत ने कहा कि रोजगार का अर्थ केवल नौकरी नहीं है, बल्कि कौशल और उद्यमिता भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं। उन्होंने श्रम के सम्मान और सभी प्रकार के कार्यों को समान प्रतिष्ठा देने की आवश्यकता बताई। वहीं नेतृत्व पर उन्होंने कहा कि एक अच्छा नेता पहले स्वयं का नेतृत्व करना सीखता है। उन्होंने कहा कि सच्चे नेतृत्व का उद्देश्य केवल अनुयायी बनाना नहीं, बल्कि नए नेताओं का निर्माण करना होना चाहिए।

भागवत ने सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ संभव हैं। उन्होंने लोगों से अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनने की अपील की।

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हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा

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