पोक्सो एक्ट के तहत सहमति की वैधानिक आयु को लेकर मंथन तेज, सहमति की आयु 18 वर्ष ही बनी रहने की वकालत

07 Aug 2026 20:49:53
पत्रकार वार्ता के दौरान विशेषज्ञों ने जारी की रिपोर्ट


नई दिल्ली, 07 अगस्त (हि.स.)।

पोक्सो एक्ट के तहत सहमति की वैधानिक आयु को को लेकर मंथन तेज हो गया है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा कि पोक्सो एक्ट 2012 के तहत सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष ही बनी रहनी चाहिए। शुक्रवार को इस संबंध में 'राष्ट्रीय परामर्श' के दौरान 'रिपोर्ट 2.0 - बहस से परे: भारत में सहमति की आयु - आगे का रास्ता' का औपचारिक विमोचन हुआ। प्रेस क्लब में आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन 'नेटवर्क फॉर एक्सेस टू जस्टिस एंड मल्टी डिसिप्लिनरी आउटरीच फाउंडेशन' द्वारा 'सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन' और 'धर्मांश फाउंडेशन' के सहयोग से किया गया।

पत्रकार वार्ता में विशेषज्ञों और वक्ताओं ने रिपोर्ट के निष्कर्षों को साझा करते हुए स्पष्ट कहा कि पोक्सो एक्ट 2012 के तहत सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष ही बनी रहनी चाहिए। वक्ताओं ने ध्यान दिलाया कि आधुनिक समय में किशोर-किशोरियां कई नए और जटिल डिजिटल खतरों के मुहाने पर हैं। इनमें मुख्य रूप से ग्रूमिंग और भावनात्मक हेरफेर, सामाजिक-पारिवारिक दबाव और मानव तस्करी और ऑनलाइन यौन शोषण, सेक्सटॉर्शन और एआई तकनीकों का दुरुपयोग शामिल है। इन बढ़ते जोखिमों के बीच सहमति की उम्र घटाने से बच्चों की कानूनी सुरक्षा का घेरा कमजोर हो सकता है।

कार्यान्वयन की चुनौतियों के आधार पर ढीला न हो कानून

रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि किशोरों के बीच बनने वाले कुछ गैर-शोषणकारी संबंधों से जुड़ी कानूनी जटिलताएं चिंता का विषय हैं।

इस संस्थाओं की सदस्य स्वाति गोयल ने बाताया कि कानून के क्रियान्वयन की व्यावहारिक समस्याओं को बच्चों के वैधानिक संरक्षण में कटौती का आधार नहीं बनाया जा सकता। कानून में बदलाव के बजाय कई कदमों पर जोर देने की बात कही गई। जैसे बाल संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना। न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता और तेजी लाना। जमीनी स्तर पर व्यापक जागरूकता तंत्र विकसित करना।

सर्वोच्च न्यायालय में हस्तक्षेप और सर्वाइवर्स की आपबीती

वक्ताओं ने जानकारी दी कि सहमति की उम्र घटाने के व्यापक कानूनी, संवैधानिक और नीतिगत प्रभावों की समीक्षा में अदालत की सहायता के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में भी एक याचिका दर्ज कर हस्तक्षेप किया गया है। मीडिया संवाद के दौरान शोषण का शिकार हुए बच्चों (सर्वाइवर्स) के वास्तविक अनुभव साझा किए गए। यह बात सामने आई कि अधिकांश बच्चे शुरुआती चरणों में ग्रूमिंग या शोषण को समझ ही नहीं पाते और काफी समय बाद उन्हें इसका अहसास होता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विजयालक्ष्मी

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