मप्र के इंदौर में हुई दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस, समावेशी, सुलभ एवं जन-केंद्रित न्याय को बढ़ावा देने पर जोर

युगवार्ता    09-Aug-2026
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इंदौर में दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस


इंदौर, 09 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के तत्वावधान में मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का रविवार को सफलतापूर्वक हो गई। कॉन्फ्रेंस में समावेशी, सुलभ एवं जन-केंद्रित न्याय को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

कॉन्फ्रेंस में न्यायपालिका, शासन, विधिक सेवा संस्थाओं, न्यायिक अधिकारियों तथा अन्य संबंधित हितधारकों के उच्च पदस्थ प्रतिनिधियों ने सहभागिता की तथा न्याय को अधिक सुलभ, समावेशी एवं समाज के कमजोर एवं वंचित वर्गों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए समकालीन चुनौतियों एवं नवीन दृष्टिकोणों पर विचार-विमर्श किया गया।

कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय “न्याय तक पहुँच को सुदृढ़ करना” तथा उप-विषय “एकजुट आवाजें, सशक्त कल: संवाद एवं गरिमा के माध्यम से न्याय तक पहुँच को आगे बढ़ाना” था। कॉन्फ्रेंस ने वेस्ट जोन में विधिक सेवाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करने के लिए अनुभवों, नवाचारपूर्ण प्रयासों एवं संस्थागत रणनीतियों के आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य समान न्याय तक पहुँच के संवैधानिक वचन को जमीनी स्तर पर सार्थक परिणामों में परिवर्तित करना था, जिसमें विशेष रूप से मध्यस्थता, जनजातीय एवं वन समुदायों, बच्चों, बंदियों एवं उनके परिवारों तथा विधिक उपचार तक पहुँच में बाधाओं का सामना करने वाले अन्य व्यक्तियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया।

कॉन्फ्रेंस के प्रथम दिवस का शुभारंभ उद्घाटन सत्र से हुआ, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशगण, केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों ने सहभागिता की।

कॉन्फ्रेंस के द्वितीय दिवस में विशेष रूप से बाल-अनुकूल न्याय, संरक्षण एवं पुनर्वास को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया गया तथा नालसा (बच्चों के लिए बाल-अनुकूल कानूनी सेवाएँ) योजना, 2024 के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया गया। विचार-विमर्श में ऐसे बाल-केंद्रित न्याय तंत्र की आवश्यकता पर बल दिया गया, जो प्रत्येक बच्चे के संरक्षण, सहभागिता, विधिक सहायता, पुनर्वास एवं गरिमा को सुनिश्चित करे। बच्चों को विधिक सहायता प्रदान करने तथा उनके संरक्षण एवं पुनर्वास से संबंधित सेवाओं के समन्वय हेतु बच्चों के लिए कानूनी सेवा इकाइयों को एकीकृत तंत्र के रूप में सुदृढ़ करने पर जोर दिया गया। चर्चा में बाल-केंद्रित नवीन पहलों, जमीनी स्तर पर पहुँच तथा विधिक सेवा संस्थाओं, न्यायपालिका, बाल संरक्षण प्राधिकरणों एवं अन्य संबंधित हितधारकों के बीच संस्थागत समन्वय के माध्यम से कमजोर एवं संवेदनशील बच्चों की समय पर पहचान एवं उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने पर भी विशेष ध्यान दिया गया।

पॉक्सो मामलों में पीड़ित-केंद्रित एवं बाल-अनुकूल दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर भी महत्वपूर्ण विचार-विमर्श हुआ। इसमें प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व, प्रतिकर, मनोसामाजिक सहयोग, पुनः आघात से संरक्षण तथा बहु-विषयक समन्वय पर विशेष जोर दिया गया। सत्र का समापन इस विचार के साथ हुआ कि प्रत्येक बच्चे को समयबद्ध संरक्षण, उपयुक्त विधिक सहायता एवं सार्थक न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए समन्वित एवं संवेदनशील विधिक सेवा तंत्र को और अधिक सुदृढ़ किया जाना आवश्यक है।

द्वितीय दिवस के द्वितीय तकनीकी सत्र में बंदियों एवं उनके परिवारों के पुनर्वास, पुनर्समावेशन तथा न्याय तक सार्थक पहुँच पर विचार-विमर्श किया गया। इसमें कारागार विधिक सेवाओं को सुदृढ़ करने तथा नालसा के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष बल दिया गया।

विचार-विमर्श में यह रेखांकित किया गया कि बंदियों के लिए न्याय तक पहुँच केवल लंबित मामलों में सहायता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसमें विधिक जागरूकता, समयबद्ध विधिक उपचार, जेल लोक अदालतें, पारिवारिक सहयोग एवं पुनर्वास भी शामिल होना चाहिए। अभिरक्षा में रह रहे व्यक्तियों की गरिमा एवं अधिकारों की रक्षा तथा उन्हें निरंतर विधिक सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया गया। चर्चा में पुनर्वास एवं पुनर्समावेशन को न्याय का अभिन्न अंग मानते हुए पारिवारिक सहयोग, आजीविका के अवसर, सामुदायिक सहभागिता, शिक्षा, कौशल विकास एवं मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया गया। विधिक सेवा संस्थाओं, कारागारों, न्यायपालिका, शासन के विभिन्न विभागों एवं अन्य हितधारकों के बीच संस्थागत समन्वय को भी प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बताया गया।

सत्र का समापन कारागार न्याय के प्रति समग्र, मानवीय एवं पुनर्वास-केंद्रित दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए हुआ, ताकि कारावास किसी व्यक्ति की गरिमा, विधिक संरक्षण, पुनर्वास एवं समाज में सार्थक पुनर्समावेशन के मार्ग में बाधा न बने।

न्याय तक पहुँच सुदृढ़ करने की साझा प्रतिबद्धता के साथ दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस का हुआ समापन

कॉन्फ्रेंस का समापन वेस्ट जोन में विधिक सेवा तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए साझा दृष्टिकोण एवं प्रतिबद्धता को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में हुआ। दोनों दिवसों के विचार-विमर्श से यह स्पष्ट हुआ कि न्याय तक पहुँच एक बहुआयामी अवधारणा है, जो केवल विवादों के न्यायिक निराकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें विधिक जागरूकता, विवादों की रोकथाम एवं समाधान, कमजोर एवं संवेदनशील व्यक्तियों का संरक्षण, पुनर्वास, सामाजिक पुनर्समावेशन तथा समुदायों का सशक्तिकरण भी शामिल है।

कॉन्फ्रेंस में मध्यस्थता एवं सामुदायिक स्तर पर विवाद समाधान, जनजातीय समुदायों एवं अन्य वंचित वर्गों के लिए प्रभावी विधिक सेवाएँ, बाल-अनुकूल न्याय एवं पुनर्वास तथा कारागार विधिक सेवाओं एवं रिहा हुए बंदियों के पुनर्समावेशन एवं उनके परिवारों के सहयोग के महत्व को प्रमुखता से रेखांकित किया गया। कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत विभिन्न पहलों ने यह भी प्रदर्शित किया कि विधिक जानकारी को हिंदी, भारतीय सांकेतिक भाषा एवं ब्रेल सहित सुलभ माध्यमों में उपलब्ध कराना आवश्यक है। इससे यह सिद्धांत और सुदृढ़ होता है कि सार्थक न्याय तक पहुँच का एक महत्वपूर्ण अंग सुलभता भी है।

विचार-विमर्श में न्यायपालिका, नालसा, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों, जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों, शासन के विभिन्न विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, सिविल सोसायटी संगठनों, पैरा-लीगल वालंटियर्स एवं समुदाय के अन्य हितधारकों के मध्य निरंतर संस्थागत सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया।

कॉन्फ्रेंस का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि विधिक सेवा आंदोलन को समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर विकसित किया जाना चाहिए तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गरीबी, दिव्यांगता, सामाजिक असुरक्षा, भौगोलिक दूरी, जागरूकता के अभाव अथवा न्याय तक पहुँच में किसी अन्य बाधा के कारण कोई भी व्यक्ति पीछे न छूटे। कॉन्फ्रेंस से उभरने वाला व्यापक संदेश स्पष्ट रहा कि न्याय सुलभ, समावेशी, गरिमापूर्ण एवं जन-केंद्रित होना चाहिए तथा समान न्याय का संवैधानिक वचन समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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