

नई दिल्ली, 10 सितंबर (हि.स.)। भारत की अध्यक्षता में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जा रहा है। यह ब्रिक्स की अध्यक्षता करने का भारत का चौथा अवसर होगा। इसका थीम सुदृढ़शीलता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण है।
ब्रिक्स प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक नीतियों के समन्वय के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरा है। यह वह प्रमुख मंच है, जहां ये प्रमुख देश ग्लोबल गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण को तैयार करते हैं। निरंतर संवाद के जरिए यह बहुपक्षीय संस्थाओं के भीतर ग्लोबल साउथ के हितों को आगे बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम बन गया है।
ब्रिक्स का एजेंडा विकास, वित्त, प्रौद्योगिकी, व्यापार तथा लोगों के बीच आपसी संपर्क जैसे व्यापक क्षेत्रों तक फैला हुआ है। ये समूह विश्व स्तर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बढ़ते आर्थिक प्रभाव और उनकी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। साथ ही यह सदस्य देशों को अपने अनुभव को साझा करने और साझा चुनौतियों का समाधान भी तलाशने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करता है।
यह आयोजन ब्रिक्स के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हो रहा है। भारत 12 से 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जिसके तहत वह चौथी बार इस समूह की अध्यक्षता संभाल रहा है। भारत की अध्यक्षता का मार्गदर्शक विषय है, “सुदृढ़शीलता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण”। ये विषय भारत के मौजूदा उपलब्धियों को मजबूत करने और संस्थागत प्रभावशीलता को बढ़ाने पर केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विकास, स्थिरता और नवाचार को एजेंडे के केंद्र में रखा गया है। इसके साथ ही यह ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को भी प्रमुखता देता है। भारत का उद्देश्य ब्रिक्स को एक रचनात्मक, समाधान-केंद्रित और परिणामोन्मुख मंच के रूप में और अधिक सशक्त बनाना है।
दुनिया की चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक संक्षिप्त नाम ब्रिक्स एक बहुत बड़े समूह का रूप ले चुका है। ये चार महाद्वीपों तक फैला एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल ब्लॉक है।
इसकी यात्रा चार देशों के बीच संवाद से शुरू होकर आज के कहीं अधिक व्यापक समूह तक पहुची है। इसकी सदस्यता के लगातार विस्तार के साथ इसमें तेल-समृद्ध देश, अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाएं और दक्षिण-पूर्व एशिया के साझेदार भी शामिल होते गए। इस विस्तारित व्यवस्था के केंद्र में आज भारत है, जो इस समूह की स्थापना के बाद से चौथी बार इसकी अध्यक्षता कर रहा है।
ब्रिक्स में 11 प्रमुख देश शामिल हैं, जिनमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात हैं। ये सदस्य देश सामूहिक रूप से विश्व की 49.5 फीसदी आबादी, वैश्विक जीडीपी के 40 प्रतिशत और विश्व व्यापार के 26 फीसदी का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये आँकड़े उनकी उल्लेखनीय जनसांख्यिकीय और आर्थिक क्षमता को रेखांकित करते हैं।
ब्रिक्स के विस्तारित सदस्य-समूह ने एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक इसकी भौगोलिक पहुँच को भी व्यापक बनाया है। यह विविधता बड़े बाजारों, प्राकृतिक संसाधनों, तकनीकी क्षमताओं और विकास के विभिन्न अनुभवों को एक साझा मंच पर लेकर आती है।
ब्रिक्स का उद्भव और इसका विस्तार
‘ब्रिक’ का संक्षिप्त नाम वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के द्वारा प्रकाशित ग्लोबल इकोनॉमिक्स पेपर में गढ़ा गया था। इकोनॉमेट्रिक एनालिसिस के आधार पर इस शोध-पत्र में अनुमान लगाया गया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन अगले पांच दशकों के दौरान विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होंगे। इन देशों की बढ़ती आर्थिक शक्ति और तीन महाद्वीपों में फैली उनकी विशाल भौगोलिक पहुंच ने उनके उभरते वैश्विक महत्व को रेखांकित किया।
इसके बाद ब्रिक की अवधारणा एक औपचारिक समूह के रूप में विकसित हुई। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के साथ ब्रिक का विस्तार होकर ब्रिक्स बन गया। ये बदलाव केवल विश्लेषकों के पहचाने गए एक आर्थिक समूह से आगे बढ़कर राजनीतिक, आर्थिक और विकासात्मक सहयोग के लिए एक औपचारिक मंच के रूप में इसके रूपांतरण को दर्शाता है।
उद्देश्य, लक्ष्य एवं सहयोग के प्रमुख क्षेत्र
ब्रिक्स की प्रारंभिक अवधारणा ऐसे प्रमुख मुद्दों पर संवाद के लिए एक मंच के रूप में की गई थी, जो अंतरराष्ट्रीय एजेंडे को प्रभावित करते हैं। शुरुआती दौर में इसका ध्यान वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करने पर केंद्रित था। इसका उद्देश्य एक अधिक लोकतांत्रिक, वैध और संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देना था।
इस समूह ने सतत आर्थिक एवं सामाजिक विकास, सामाजिक समावेशन तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच साझा समृद्धि पर भी विशेष जोर दिया। समय के साथ, इन प्राथमिकताओं ने सदस्य देशों के बीच अधिक गहरे और व्यापक सहयोग की मजबूत नींव तैयार की है।
लगातार आयोजित शिखर सम्मेलनों के जरिए ब्रिक्स का सहयोग धीरे-धीरे बढ़कर रणनीतिक वैश्विक मुद्दों और व्यावहारिक सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों तक विस्तृत हुआ है। इसके एजेंडे में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार तथा कृषि जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इसके साथ ही, यह श्रम एवं रोजगार, दूरसंचार, अंतरराष्ट्रीय वित्त और वैश्विक आर्थिक स्थिति जैसे विषयों पर भी ध्यान केंद्रित करता है।
उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स, विश्व व्यापार संगठन और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और समानता का प्रबल समर्थन करता है। इन प्रयासों का उद्देश्य ग्लोबल गवर्नेंस को अधिक समावेशी, प्रभावी और वर्तमान चुनौतियों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाना है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर