सांस्कृतिक अस्मिता की ‘घर वापसी’: छत्तीसगढ़ का जनजाति समाज फिर लौटा अपनी मूल संस्कृति की ओर

12 Sep 2026 13:44:53
धर्मस्वातंत्र्य कानून का असर, बदल रहा है, छग


धर्म स्वातंत्र्य कानून बना कारण, बस्तर से सरगुजा तक बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

रायपुर, 12 सितंबर (हि.स.)। बस्तर के जंगलों में फिर मांदर की थाप सुनाई देने लगी है। देवगुड़ियों में दीप जल रहे हैं, पेनगुड़ियों में पारंपरिक पूजा-पद्धतियां लौट रही हैं और गांवों में आमा खाई, दियारी तथा नवाखाई, पोला तिहार जैसे पर्व अपनी पुरानी परंपराओं के साथ मनाए जाने लगे हैं। वर्षों से अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर दबाव और बदलाव की चर्चाओं के बीच छत्तीसगढ़ के जनजाति समाज में अब अपनी जड़ों की ओर लौटने की एक नई तस्वीर दिखाई दे रही है।

दरअसल, बस्तर से सरगुजा तक इस बदलाव को ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026’ के लागू होने से जोड़कर देखा जा रहा है। कानून ने जबरन, भय, छल, धोखाधड़ी और प्रलोभन आधारित मतांतरण के खिलाफ कठोर कानूनी व्यवस्था देने के साथ जनजातीय समाज में अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर नए आत्मविश्वास का वातावरण बनाया है।

त्योहारों में बढ़ती भागीदारी

बस्तर के कोंडागांव, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे इलाकों में वर्षों से उपेक्षित बताए जा रहे पारंपरिक देवस्थलों में फिर से पूजा-अर्चना और सामुदायिक गतिविधियां बढ़ने की बात सामने आई है। जिन परिवारों ने मतांतरण के दौर में पारंपरिक देवस्थलों से दूरी बना ली थी, उनके फिर से देव-समितियों से जुड़ाव शुरू हो गया है।

यहां एक बार फिर द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज के कहे का असर कि “व्यक्ति को धर्म अपने माता-पिता, वंश, परंपराओं, संस्कारों (मूल्यों) और शास्त्रों से विरासत में मिलता है। यदि कोई व्यक्ति अपने पिता, जन्मस्थान या पूर्वजों को नहीं बदल सकता, तो वह अपना धर्म भी नहीं बदल सकता है। कोई व्यक्ति तिलक लगाना बंद कर दे , मंदिरों में जाना छोड़ दे या किसी अन्य विधि से प्रार्थना करने लगे, तो उसके धर्म का मूल तत्व नहीं बदलता। धर्म व्यक्ति के विश्वदृष्टि, उसके अंतर्मन और उसके पूर्वजों से जुड़ा होता है” दिख रहा है।

स्थानीय निवासियों के अनुसार, कानून के बाद गांवों में बाहरी धार्मिक गतिविधियों को लेकर पैदा हुआ भय कम हुआ है और युवाओं में अपनी देव संस्कृति को लेकर गौरव की भावना बढ़ी है। इसी के साथ आमा खाई, दियारी और नवाखाई जैसे पारंपरिक पर्व भी अपनी मूल पद्धतियों के अनुसार मनाए जाने लगे हैं।

सरकार का दावा: धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा, जबरन मतांतरण पर रोक

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मीडिया सलाहकार कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार झा का कहना है कि कानून किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था या पूजा-पद्धति में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है, पर आर्थिक सहायता, नौकरी, विवाह, शिक्षा, इलाज, भय, दबाव अथवा प्रलोभन के जरिए धर्म बदलने के लिए प्रेरित करना अलग विषय है। कानून का उद्देश्य स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन और जबरन अथवा प्रलोभन आधारित मतांतरण के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना है।

‘घर वापसी’ ने दिया सांस्कृतिक बदलाव को नया आधार

इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ‘घर वापसी’ को माना जा रहा है। नए कानून में यदि कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म अथवा पूर्वजों की संस्कृति में वापस लौटता है, तो उसे धर्मांतरण नहीं माना गया है। ऐसी वापसी के लिए 60 दिन पूर्व नोटिस देने की आवश्यकता भी नहीं है। इस प्रावधान ने उन लोगों के लिए प्रक्रिया को सरल बनाया है, जो अपनी पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में लौटना चाहते हैं।

कवर्धा के पंडरिया से लेकर जांजगीर, शक्ति और जशपुर के वनांचलों तक ऐसे आयोजनों का उल्लेख सामने आया है, जिनमें जनजाति परिवारों ने अपने पूर्वजों की परंपराओं में लौटने की घोषणा की। कवर्धा में हुए एक आयोजन में 200 से अधिक जनजाति परिवारों के साथ एक चर्च पादरी ने भी सनातन धर्म और जनजाति संस्कृति को अपनाया है।

जल, जंगल, जमीन के साथ संस्कृति भी पहचान

छत्तीसगढ़ का जनजातीय समाज अपनी पहचान को जल, जंगल और जमीन के साथ अपनी लोक-संस्कृति, ग्राम देवताओं, कुल परंपराओं, भाषा और सामुदायिक रीति-रिवाजों से जोड़कर देखता है। गोंड, बैगा, मुड़िया, माड़िया, उरांव, कंवर और पंडो जैसे समुदायों की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं पीढ़ियों से प्रकृति और स्थानीय देवी-देवताओं के साथ जुड़ी रही हैं। ऐसे में किसी परिवार का धर्म बदलना उसके व्यक्तिगत विश्वास तक सीमित न रहकर कई बार विवाह, पारिवारिक संबंध, अंतिम संस्कार, सामुदायिक सहभागिता और ग्राम परंपराओं पर भी उसका प्रभाव पड़ने की बात कही जाती है।

ग्राम सभा को मिला नया भरोसा

जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक बदलाव के साथ ग्राम सभाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम के तहत अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को स्थानीय परंपराओं और सामुदायिक जीवन से जुड़े विषयों में महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। नए कानून के बाद बस्तर और सरगुजा संभाग के कई गांवों में ग्राम सभाओं ने बाहरी अब्राहमिक पंथों के प्रचारकों की गतिविधियों को लेकर प्रस्ताव पारित किए हैं। ऐसे मामलों में ग्राम सभा द्वारा प्रशासन को सूचना देने और पुलिस कार्रवाई के अनेक प्रकरण सामने आए हैं।

सात दशक पुरानी बहस के बाद आया कानून

इस बदलाव की पृष्ठभूमि समझने के लिए 1954 तक लौटना होगा। आजादी के बाद मध्य भारत के आदिवासी और वनवासी इलाकों से धर्मांतरण को लेकर शिकायतें सामने आईं। तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार ने इन शिकायतों की जांच के लिए नागपुर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में आयोग बनाया।

वरिष्ठ अधिवक्ता धनंजय प्रताप सिंह के अनुसार, नियोगी आयोग ने प्रदेश के लगभग सभी जिलों का दौरा किया, हजारों लोगों के बयान दर्ज किए तथा सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय नागरिकों से बातचीत की। करीब दो वर्ष की जांच के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। रिपोर्ट में आर्थिक सहायता, सामाजिक दबाव, लालच और अन्य प्रभावों के माध्यम से होने वाले धर्म परिवर्तन को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी।

धनंजय प्रताप सिंह का कहना है कि आयोग ने ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी कानूनी नियंत्रण की सिफारिश की थी, लेकिन राजनीतिक कारणों से रिपोर्ट लागू नहीं हो सकी। उनके अनुसार, लंबे समय तक इस विषय पर प्रभावी कानूनी कार्रवाई नहीं होने के कारण जनजातीय क्षेत्रों में सामाजिक संकट गहराता गया।

गोंडवाना गोंड महासभा के प्रदेश महामंत्री विकेश हिचामी के अनुसार, जनजातीय समाज लंबे समय से बल, भय, प्रलोभन अथवा धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन रोकने के लिए कठोर कानून की मांग करता रहा है। उनके अनुसार इसी मांग और बदलती परिस्थितियों के आधार पर नया विधेयक तैयार किया गया, जोकि राज्यपाल द्वारा 8 अप्रैल 2026 को मंजूरी के बाद 10 जुलाई 2026 को अधिसूचना जारी होने के साथ ही कानून के रूप में प्रदेश में प्रभावी हुआ।

कानून की सख्ती ने बनाया सुरक्षा कवच

नए कानून में अपराध की प्रकृति और पीड़ित की स्थिति के अनुसार दंड निर्धारित किए गए हैं। सामान्य मामलों में बल, लालच, धोखाधड़ी अथवा अनुचित माध्यम से मतांतरण कराने पर 7 से 10 वर्ष तक की सजा और कम से कम 5 लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। यदि पीड़ित महिला, नाबालिग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित है तो सजा 10 से 20 वर्ष तक हो सकती है और न्यूनतम 10 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। सामूहिक मतांतरण के मामलों में 10 वर्ष से आजीवन कारावास तक की सजा और न्यूनतम 25 लाख रुपये जुर्माने की व्यवस्था है।

स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन के लिए भी प्रक्रिया

कानून स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन के लिए भी एक निर्धारित प्रक्रिया रखता है। इच्छुक व्यक्ति को अधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन करना होगा। इसकी जानकारी संबंधित वेबसाइट, ग्राम पंचायत और स्थानीय थाने में सार्वजनिक की जाएगी। इसके बाद 30 दिनों तक दावे और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी तथा प्रशासन जांच करेगा कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हो रहा है या नहीं। निर्धारित तिथि से 90 दिनों के भीतर प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर आवेदन स्वतः निरस्त माना जाएगा।

कानून की संवैधानिक कसौटी भी महत्वपूर्ण

वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष कुमार के अनुसार, इस कानून की संवैधानिक पृष्ठभूमि में संविधान का अनुच्छेद 25 और उच्चतम न्यायालय का रेवरेंड स्टैनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977) का फैसला महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, न्यायालय ने धर्म के प्रचार की स्वतंत्रता को स्वीकार करते हुए बल, धोखाधड़ी या प्रलोभन के माध्यम से किसी दूसरे व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराने को अनुच्छेद 25 के अधिकार का हिस्सा नहीं माना था। इसमें किसी अन्य व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराने का मौलिक अधिकार शामिल नहीं है।

गोंडवाना गोंड महासभा के प्रदेश महामंत्री विकेश हिचामी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ की मौजूदा तस्वीर को सिर्फ धर्म परिवर्तन अथवा उसके विरुद्ध कानून के चश्मे से देखना इस बदलाव के सांस्कृतिक पक्ष को छोटा कर देगा। जनजातीय समाज के लिए उसकी देवगुड़ी, ग्राम देवी-देवता, लोकगीत, पर्व, रीति-रिवाज और सामुदायिक परंपराएं उसकी पहचान का हिस्सा हैं, इसीलिए ‘घर वापसी’ की घटनाओं को हम अपनी मूल सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्प्राप्ति के रूप में देख रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि 73 साल पहले नियोगी आयोग ने तत्कालीन मध्यप्रदेश जिसमें छग भी शामिल था, में हो रहे व्यापक कन्वर्जन की ओर ध्यान दिलाया था। आज उसके प्रकाश में बना 2026 का कानून बहुत कुछ कहता है। अब छत्तीसगढ़ में आगे देखना यही होगा कि धर्म स्वातंत्र्य कानून अपने घोषित उद्देश्य के अनुसार जबरन, छल और प्रलोभन आधारित मतांतरण पर रोक लगाते हुए जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को कितना संरक्षण दे पाता।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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