हिमालयी पर्वत शिखर लांगटांग लिरुंग पर हिमनदी का हिस्सा अभी भी मौजूद, खिसकना बाकी

17 Sep 2026 19:12:53
चीन से नेपाल को प्राप्त सेटेलाइट तस्वीर


काठमांडू, 17 सितंबर (हि.स.)।

नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित हिमालयी पर्वत शिखर लांगटांग लिरुंग के जिस हिस्से से हिमनदी और चट्टानें खिसक कर नेपाली क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ का कारण बनी थीं, वहां अभी भी हिमनदी और पहाड़ का कुछ हिस्सा अस्थिर अवस्था में मौजूद है। यह कभी भी खिसक सकता है।

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन की ओर से उपलब्ध कराए जा रहे सैटेलाइट चित्रों और आंकड़ों में लांगटांग लिरूंग को लेकर दो महत्वपूर्ण संकेत सामने आए हैं। इसके अनुसार जिस हिस्से से हिमनदी और चट्टानें खिसककर विनाशकारी बाढ़ की वजह बनी थीं, वहां अभी भी हिमनदी और पहाड़ का कुछ हिस्सा अस्थिर अवस्था में मौजूद है। इसके अलावा उसी क्षेत्र में बर्फ से ढकी रहने वाली एक झील अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है।

जल विज्ञान तथा जलस्रोत अनुसंधान केंद्र के उप कार्यकारी निदेशक विक्रम श्रेष्ठ के अनुसार, चीन से प्राप्त हालिया सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि हिमनदी का कुछ हिस्सा अभी भी लटका हुआ है और भविष्य में खिसक सकता है। हालांकि, यह हिस्सा कितना बड़ा है और कब खिसकेगा, इसका अभी निश्चित आकलन नहीं किया जा सका है। इसलिए केवल इन संकेतों के आधार पर तत्काल एक और बड़े हिमस्खलन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज के तिब्बती पठार अनुसंधान संस्थान के अध्ययन के अनुसार, 26 अगस्त को लांगटांग लिरूंग से खिसका बर्फ और चट्टान का हिस्सा करीब 980 मीटर चौड़ा और 780 मीटर लंबा था। इसका क्षेत्रफल लगभग 0.76 वर्ग किलोमीटर और मात्रा 7 करोड़ घनमीटर से अधिक आंकी गई है। नीचे की ओर बढ़ते समय इस विशाल मलबे ने रास्ते में अन्य चट्टानों और सामग्री को भी अपने साथ बहाया।

विशेषज्ञों के अनुसार, सैटेलाइट विश्लेषण में संकेत मिला है कि 12 से 24 अगस्त के बीच उस पहाड़ी हिस्से में असामान्य हलचल बढ़ गई थी और चट्टानी हिस्सा प्रतिदिन करीब 0.4 मीटर की दर से खिसक रहा था। हालांकि, यह विश्लेषण घटना के बाद किया गया है और इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उस समय हिमस्खलन की सटीक भविष्यवाणी की गई थी।

सैटेलाइट तस्वीरों में उसी इलाके में पहले बर्फ से ढकी रहने वाली एक झील अब स्पष्ट दिखाई दे रही है। इसका क्षेत्रफल करीब 0.19 वर्ग किलोमीटर, यानी लगभग 27 अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मैदानों के बराबर है। अभी झील की गहराई और उसमें मौजूद पानी की मात्रा के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस झील से पानी रिसकर यदि पहाड़ की दरारों में पहुंच रहा है तो इससे चट्टानी हिस्से की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसलिए झील और हिमनदी क्षेत्र की लगातार सैटेलाइट निगरानी जरूरी मानी जा रही है।

फिलहाल वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि पर्वत शिखर लांगटांग लिरूंग में कुछ बर्फ और चट्टानी हिस्सा अभी भी अस्थिर है, लेकिन उसके खिसकने का समय, आकार और संभावित प्रभाव का निश्चित अनुमान अभी उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से क्षेत्र की नियमित निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि लांगटांग लिरुंग नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित 7,234 मीटर ऊंचा एक प्रमुख हिमालयी पर्वत शिखर है, जो अपनी अत्यधिक खड़ी ढलानों, बर्फ के ग्लेशियरों और विशाल चट्टानी संरचनाओं के लिए चर्चित है।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास

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