श्रम साधक मजबूत होंगे तो समाज और भविष्य दोनों मजबूत होंगे

19 Sep 2026 21:49:53
संत रविदास जयंती पर भोपाल में विराट श्रम साधक संगम, होसबाले बोले


संत रविदास जयंती पर भोपाल में विराट श्रम साधक संगम, होसबाले बोले


संत रविदास जयंती पर भोपाल में विराट श्रम साधक संगम, होसबाले बोले


संत रविदास जयंती पर भोपाल में विराट श्रम साधक संगम, होसबाले बोले


- संत रविदास जयंती पर भोपाल में विराट श्रम साधक संगम, होसबाले बोले- श्रम को सम्मान और हर व्यक्ति को अवसर देना ही सामाजिक समरसता की आधारशिला

भोपाल, 19 सितंबर (हि.स.)। समाज की वास्तविक ताकत उसके संसाधनों से नहीं बल्कि उसके हर व्यक्ति की भागीदारी, श्रम और आत्मीयता से बनती है। जिस समाज में श्रम करने वाले हाथों को सम्मान मिलता है, कमजोर को सहारा मिलता है और हर बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, वही समाज अपने भविष्य को मजबूत कर सकता है। इसी भाव को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि “श्रम साधक मजबूत होंगे तो समाज और भविष्य दोनों मजबूत होंगे।” उन्होंने कहा कि समाज में कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, कर्म के प्रति निष्ठा, मन की शुद्धता और कर्तव्यबोध ही व्यक्ति के कार्य को गरिमा प्रदान करते हैं।

संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती के अवसर पर भोपाल के रवीन्द्र भवन में आयोजित विराट 'श्रम साधक संगम' में एक हजार से अधिक श्रम साधकों और समाजजनों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में मध्यभारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडेय, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर मंचासीन रहे। इस अवसर पर भोपाल में चल रहे श्रम साधक मिलनों के अनुभव और उनके माध्यम से समाज में विकसित हो रहे संपर्क एवं आत्मीयता के प्रयासों की जानकारी भी साझा की गई।

52 प्रकार के श्रम से जुड़े लोगों तक पहुंचने का प्रयास

कार्यक्रम में श्रम साधक कार्य का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विक्रम सिंह ने बताया कि समाज का कोई वर्ग संपर्क और संवाद से वंचित न रहे, इस उद्देश्य से श्रम साधकों के बीच संपर्क का उपक्रम शुरू किया गया। इसके लिए समाज में विभिन्न प्रकार के श्रम से जुड़े लोगों की सूची तैयार की गई, जिसमें 52 प्रकार के कार्य सामने आए। इन सभी श्रम साधकों तक निरंतर पहुंच बनाने के लिए मिलनों की व्यवस्था विकसित की गई और वर्तमान में भोपाल में लगभग 40 श्रम साधक मिलन संचालित हो रहे हैं। रविदास जी के जीवन में श्रम, साधना, समानता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का जो संदेश दिखाई देता है, वही इस उपक्रम की प्रेरणा का आधार बताया गया।

मिलन केवल मिलने या मनोरंजन का माध्यम नहीं

श्रम साधक मिलन से जुड़े अवतार सिंह और रामस्वरूप ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इन मिलनों का उद्देश्य केवल औपचारिक मुलाकात या मनोरंजन नहीं है। यहां श्रम साधक एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं, अपने काम के प्रति निष्ठा मजबूत करते हैं और समाज के सामने मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों पर भी चर्चा करते हैं।

नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना, परिवार और बच्चों के भविष्य की चिंता करना तथा जरूरत के समय एक-दूसरे के साथ खड़ा होना इस संपर्क प्रक्रिया का हिस्सा है। उनके अनुसार, जब औपचारिक संपर्क आत्मीय संबंध में बदलता है, तभी सहयोग की वास्तविक भावना विकसित होती है और यही आगे चलकर सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकती है।

कर्म को पूजा मानने की भारतीय दृष्टि

मुख्य संबोधन में दत्तात्रेय होसबाले ने संत रविदास जी के जीवन और भारतीय परंपरा में श्रम की प्रतिष्ठा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे संतों ने कर्म को पूजा माना है। शरीर से किया जाने वाला श्रम भी आराधना का एक रूप है। पूजा केवल मंदिर में जाकर पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं है। व्यक्ति अपने कर्म को पूरी निष्ठा, शुद्ध मन और आराधना के भाव से करता है तो वही कर्म पूजा बन जाता है।

उन्होंने महाभारत में वर्णित धर्मव्याध की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म का संबंध किसी विशेष कार्य अथवा सामाजिक पहचान तक सीमित नहीं है। व्यक्ति जिस कर्म में लगा है, उसे निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ करना धर्म का महत्वपूर्ण स्वरूप है। कर्म की महानता उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसे करने वाले व्यक्ति की दृष्टि और निष्ठा से तय होती है।

उन्होंने महर्षि वेदव्यास का उदाहरण देते हुए कहा कि महानता जन्म या पेशे से निर्धारित नहीं होती। मछुआरे परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी अपने कर्म और ज्ञान से महर्षि वेदव्यास बन सकता है। इसलिए किसी व्यक्ति को उसके कार्य के आधार पर छोटा समझना दृष्टि का दोष है।

सामाजिक ऊंच-नीच दूर करने के लिए बढ़ानी होगी आत्मीयता

होसबाले ने कहा कि समाज में ऊंच-नीच का जो दोष आया है, उसे सही दृष्टि और समन्वय से दूर करना होगा। इसके लिए विभिन्न वर्गों के बीच आत्मीयता बढ़ाना आवश्यक है। सामाजिक समरसता केवल भाषणों से नहीं बनती, बल्कि लोगों को एक-दूसरे के जीवन, श्रम और परिस्थितियों से जुड़ना पड़ता है।

उन्होंने सृष्टि और समाज की संरचना का उदाहरण देते हुए विश्वकर्मा जी का उल्लेख किया और कहा कि निर्माण तथा श्रम भारतीय चिंतन में सदैव सम्मानित रहे हैं।

हम सभी राष्ट्रांगभूता, राष्ट्र के अभिन्न अंग

सरकार्यवाह ने कहा, “हम सभी राष्ट्रांगभूता हैं”, अर्थात राष्ट्र के अंग हैं। राष्ट्र केवल भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, श्रम, संस्कार, संबंध और दायित्व से मिलकर बनता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति की राष्ट्र के प्रति भूमिका और जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि शाखा और मिलन जैसे उपक्रम इसी भाव को मजबूत करते हैं। जब व्यक्ति स्वयं को समाज और राष्ट्र से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग मानता है, तो उसके भीतर समाज के लिए कुछ करने की भावना पैदा होती है। शरीर को स्वस्थ रखना, परिवार को संस्कारित बनाना और समाज के कमजोर वर्गों के साथ खड़ा होना भी नागरिक दायित्व का हिस्सा है।

मिलन मिलने की शुरुआत है, बदलाव का माध्यम बनेगा

होसबाले ने कहा कि मिलन अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह मिलने की शुरुआत है। नियमित संपर्क से परिचय संबंध में और संबंध आत्मीयता में बदलता है। यही आत्मीयता आगे चलकर समाज में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकती है।उन्होंने समाज के समर्थ वर्ग से अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करने और जरूरतमंद वर्ग से आत्मविश्वास तथा परिश्रम बनाए रखने का आह्वान किया। गुजरात के अकाल के समय संघ स्वयंसेवकों द्वारा किए गए सेवा कार्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने उस वृद्ध महिला का प्रसंग सुनाया, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद सेवा केंद्र पर सुखड़ी देकर अपना योगदान दिया। उन्होंने कहा कि समाज के प्रति दायित्व केवल अधिक संसाधन रखने वालों का नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का है।

श्रमिक का बच्चा वैज्ञानिक और श्रमिक परिवार का बच्चा संत बन सकता है

उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की वर्तमान स्थिति देखकर उसके भविष्य की सीमा तय नहीं की जा सकती। एक श्रमिक का बच्चा वैज्ञानिक बन सकता है और श्रमजीवी परिवार का बच्चा संत बन सकता है, इसलिए परिवार और समाज का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर मिले। आर्थिक परिस्थितियां किसी बच्चे की अंतिम पहचान नहीं होनी चाहिए। उचित शिक्षा और अवसर मिलने पर श्रम साधकों के परिवारों के बच्चे प्रोफेसर, वैज्ञानिक और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञ बन सकते हैं।

“निर्बल के बल राम”- सामूहिक शक्ति बने सहारा

होसबाले ने कहा कि श्रम साधना करने वाले लोग कई बार सामाजिक रूप से निर्बल हो जाते हैं। ऐसे में समाज को उनके साथ खड़ा होना होगा। उन्होंने कहा, “निर्बल के बल राम।” यहां राम को समाज की सामूहिक शक्ति के अर्थ में रखते हुए उन्होंने कहा कि सक्षम लोगों को आगे आकर जरूरतमंदों का सहारा बनना चाहिए।उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रम साधक केवल सहायता प्राप्त करने वाला वर्ग नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं समाज की शक्ति हैं। आवश्यकता उन्हें सम्मान, अवसर, सहयोग और आगे बढ़ने का वातावरण देने की है।

श्रम की प्रतिष्ठा से ही मजबूत होगा राष्ट्र

उन्होंने कहा कि समाज में श्रम की प्रतिष्ठा हर स्तर पर बढ़नी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में किसी न किसी रूप में शारीरिक श्रम करना चाहिए। शरीर से काम करने वाले और मस्तिष्क से काम करने वाले दोनों राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के समान रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं।भारतीय राष्ट्र की अवधारणा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह देश एक जीवंत राष्ट्रपुरुष के समान है, जिसके हजारों नेत्र और लाखों हाथ हैं। कोई मस्तिष्क से काम करता है तो कोई हाथों से—दोनों मिलकर राष्ट्र की जीवन-व्यवस्था चलाते हैं। इसलिए किसी के कार्य को कमतर समझने का आधार नहीं है।

इस दौरान आपका कहना था कि सामाजिक समरसता केवल सामाजिक संपर्क तक सीमित नहीं रह सकती। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में भी व्यावहारिक सहयोग की व्यवस्था विकसित करनी होगी। जरूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए ट्यूशन और शिक्षा, चिकित्सा सुविधा तथा रोजगार के साधनों के निर्माण की दिशा में समाज को काम करना चाहिए। अलग भाषा बोलने वाला व्यक्ति भी स्वयं को इस राष्ट्र में अनाथ न समझे। वह भी भारत माता का पुत्र है और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका है।

होसबाले ने कहा कि समाज को मजबूत बनाने के लिए केवल आर्थिक सहयोग पर्याप्त नहीं है। श्रम साधकों और उनके परिवारों को नशे जैसी समस्याओं से बचाना भी सामूहिक दायित्व है। महिला सुरक्षा को भी उन्होंने सामाजिक मजबूती से जोड़ा और कहा कि प्रत्येक वर्ग को सुरक्षित और सम्मानपूर्ण वातावरण मिलना आवश्यक है।उन्होंने परिवारों को संस्कारित बनाने और बच्चों को आगे बढ़ने के अवसर देने पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, बच्चे की प्रतिभा उसकी पारिवारिक या आर्थिक पृष्ठभूमि से तय नहीं होती; उचित अवसर और प्रोत्साहन मिलने पर वह किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकता है। उन्होंने कहा कि रविदास जयंती पर श्रम साधकों का यह संगम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनके जीवन में श्रम और साधना का जो संबंध दिखाई देता है, वह आज भी समाज के लिए प्रासंगिक है। कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र के साथ हुआ।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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