युवा प्रश्न पूछें, संवाद से जुड़ें और उनके भीतर की संवेदना को समझें : दत्तात्रेय होसबाले

युगवार्ता    20-Sep-2026
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राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद में 250 विद्यार्थियों व प्राध्यापकों ने लिया भाग, जिज्ञासाओं का सरकार्यवाह ने किया समाधान


राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद में 250 विद्यार्थियों व प्राध्यापकों ने लिया भाग, जिज्ञासाओं का सरकार्यवाह ने किया समाधान


- राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद में 250 विद्यार्थियों व प्राध्यापकों ने लिया भाग, 11 जिज्ञासाओं का सरकार्यवाह ने किया समाधान

- राम जन्मभूमि संघर्ष पर आधारित डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन

भोपाल, 20 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि नई पीढ़ी का प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। युवाओं के प्रश्नों को सुनने, समझने और संवाद के माध्यम से उत्तर देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी युवा को उसके बाहरी स्वरूप या विचारों के आधार पर देखने के बजाय उसके भीतर की संवेदना और सकारात्मक शक्ति को समझना चाहिए।

समाज सेवा न्यास द्वारा आयोजित संवाद में लगभग 250 विद्यार्थी एवं प्राध्यापक शामिल हुए। कार्यक्रम में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के साथ मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय तथा भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर मंचस्थ रहे। भारत माता की प्रतिमा पर पुष्पार्चन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके बाद राम जन्मभूमि संघर्ष पर आधारित डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया। विद्यार्थियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक, तकनीकी और राष्ट्रीय विषयों से जुड़ी 11 जिज्ञासाएं रखीं।

प्रश्न करने वाले युवाओं से संवाद होना चाहिए

सोशल मीडिया और वैचारिक ‘इको चैंबर’ के दौर में युवाओं से जुड़ने के प्रश्न पर होसबाले ने कहा कि आज पीढ़ियों को ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ जैसे नामों से परिभाषित किया जाता है, जबकि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को ‘युवा भारत’ कहा था। उन्होंने कहा कि नरेंद्र के रूप में स्वामी विवेकानंद ने भी प्रश्न किए थे और नचिकेता का प्रश्न करना भारतीय परंपरा में प्रसिद्ध है। इसलिए नई पीढ़ी सत्ता, समाज या किसी संस्था से प्रश्न करती है तो उसे गलत नहीं माना जाना चाहिए।

उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि युवाओं के प्रश्नों को सुनना और संवाद में जुड़ना चाहिए। केवल प्रश्न पूछने के कारण किसी को अस्वीकार करने के बजाय उसकी बात समझने का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं के बाहरी रूप को देखने के बजाय उनके भीतर की संवेदना को देखना चाहिए।

राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद मानसिक स्वतंत्रता भी जरूरी

भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो चुका है, लेकिन ‘डिकोलोनाइजेशन ऑफ माइंड’ की प्रक्रिया अभी जारी है। भारतीय सभ्यता के मूल्यों, दृष्टि और शब्दावली पर अधिक शोध की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने ‘धर्म’ की अवधारणा का उदाहरण दिया। उनके अनुसार भारतीय दृष्टि को समझने के लिए इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन आवश्यक है।

विद्यार्थियों के बीच वैचारिक वातावरण बदलने के उपाय पर उन्होंने स्वाध्याय मंडल, ग्रुप डिस्कशन और राष्ट्रहित से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियां शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने बेंगलुरु के विद्यार्थियों के ‘नमो भारती’ कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि छोटी-छोटी गतिविधियों के माध्यम से भी सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकता है।

तकनीक साधन बने, नियंत्रण मानव के हाथ में रहे

डिजिटल युग में संघ के कार्यों और तकनीक के उपयोग से जुड़े प्रश्न पर होसबाले ने कहा कि मूल विचार और मूल्य स्थायी होते हैं, लेकिन समय के साथ उपलब्ध साधनों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाए, लेकिन वहां क्या और किस उद्देश्य से प्रसारित किया जा रहा है, यह व्यक्ति के संस्कार और विवेक पर निर्भर करता है। तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए तथा मनुष्य तकनीक का गुलाम बनने के बजाय उसे अपने नियंत्रण में रखे।

उन्होंने तकनीक के लोकतंत्रीकरण की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। साथ ही तकनीक पर मानवीय नियंत्रण बनाए रखना जरूरी है। यदि यह नियंत्रण समाप्त हो गया तो तकनीक व्यक्ति के लिए साधन रहने के बजाय उसे नियंत्रित करने वाली शक्ति बन सकती है।

विमर्श के शस्त्र तर्क, सत्य और अध्ययन होने चाहिए

वैचारिक संघर्ष के प्रश्न पर सरकार्यवाह ने कहा कि यदि इसे ‘विमर्श युद्ध’ कहा जा रहा है तो उसके लिए प्रभावी साधन भी आवश्यक हैं। इसके लिए तर्क सत्य और अध्ययन पर आधारित हों, अपनी बात रखने में स्पष्टता हो, प्रभावी माध्यमों का उपयोग किया जाए और इसके लिए प्रशिक्षण भी हो।

शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टि के स्थान से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने कहा कि इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक विज्ञान के कई क्षेत्रों में भारत को लंबे समय तक पश्चिमी दृष्टि से देखने का प्रयास हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की कुरीतियों को स्वीकार करते हुए उनके सुधार के प्रयास जरूरी हैं, लेकिन समाज की सकारात्मक उपलब्धियों और परंपराओं का भी वस्तुनिष्ठ अध्ययन होना चाहिए।

भ्रष्टाचार से लड़ाई की शुरुआत स्वयं से हो

भ्रष्टाचार पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन इसकी शुरुआत व्यक्ति के अपने जीवन से होनी चाहिए। स्वयंसेवकों को पहले स्वयं भ्रष्टाचार से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए और समाज में भी इसके विरुद्ध जागरूकता विकसित करनी चाहिए।

डिजिटल युग में संघ के कार्यों में बदलाव को लेकर उन्होंने कहा कि मूल विचार और मूल्य अपरिवर्तित रहते हुए तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए। तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तकनीक मनुष्य के नियंत्रण में रहे, मनुष्य तकनीक का गुलाम न बने।

शिक्षित वर्ग की जिम्मेदारी अधिक है

अपने पाथेय में सरकार्यवाह ने कहा कि विद्यार्थी और प्राध्यापक समाज का सुशिक्षित वर्ग हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की शिक्षा में समाज का योगदान होता है, इसलिए शिक्षा को केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम न मानकर समाज के प्रति दायित्व से जोड़ना चाहिए।उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत जिम्मेदारियों और समाज के प्रति दायित्व के बीच समन्वय ही धर्म का एक महत्वपूर्ण स्वरूप है। समाज को आत्मविश्वास के साथ सामर्थ्यवान भी बनना होगा, लेकिन यह शक्ति मानवता और राष्ट्र के हित के लिए होनी चाहिए।

उन्होंने विद्यार्थियों से यह विचार करने का आह्वान किया कि समाज के प्रति उनके भीतर कितनी गहरी संवेदना है और उस संवेदना को कार्य में बदलने की उनकी क्या योजना है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भारतीय दृष्टि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने इतिहास में यहूदियों और दलाई लामा जैसे शरणार्थियों को आश्रय दिया है, इसलिए इस विचार के पीछे भारत का अपना ऐतिहासिक अनुभव भी है।

कार्यक्रम में विद्यार्थियों और सरकार्यवाह के बीच हुए संवाद में युवा, शिक्षा, संस्कृति, राष्ट्रबोध, तकनीक, भ्रष्टाचार, सामाजिक समरसता और नागरिक दायित्व जैसे विषय प्रमुख रहे। कार्यक्रम का समापन ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक उद्घोष के साथ हुआ।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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