खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटने से मिलेगी राहत, लेकिन आत्मनिर्भरता के लिए आधुनिक बीज तकनीक जरूरी: एनईएफआई

30 Sep 2026 16:47:53

- बीटी कपास की सफलता का दिया उदाहरण, जीएम सरसों पर समयबद्ध निर्णय की मांग

नई दिल्ली, 30 सितंबर (हि.स.)। खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार की ओर से आयात शुल्क में कटौती के फैसले का नेशनल फार्मर्स एम्पावरमेंट इनिशिएटिव (एनईएफआई) ने स्वागत किया है। संगठन ने कहा कि शुल्क में कमी से उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए किसानों को आधुनिक कृषि एवं बीज तकनीक उपलब्ध कराना जरूरी है। संगठन ने जीएम फसलों के मुद्दे पर भी समयबद्ध और विज्ञान आधारित निर्णय लेने की मांग की है।

सरकार ने 24 सितंबर को कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य तथा कच्चे सोयाबीन और पाम ऑयल पर इसे 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया है।

एनइएफआई ने कहा कि पिछले एक वर्ष में खाद्य तेलों की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2024-25 में देश ने 160.72 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया, जिससे देश की करीब दो-तिहाई जरूरत आयात के जरिए पूरी हुई। इस पर लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए, जो केंद्रीय कृषि बजट से भी अधिक है।

एनइएफआई के राष्ट्रीय संयोजक किशोर जायसवाल ने कहा कि आयात शुल्क में कटौती से उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी, लेकिन यह समस्या के कारण का समाधान नहीं है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, उसका असर देश के परिवारों के बजट के साथ-साथ हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ता है। इसका स्थायी समाधान हमारे खेतों में है और इसके लिए किसानों को उपलब्ध सर्वोत्तम बीज तकनीक का विकल्प मिलना चाहिए।

एनइएफआई ने कृषि क्षेत्र में तकनीक के प्रभाव का उदाहरण देते हुए बीटी कपास की सफलता का उल्लेख किया। संगठन के अनुसार, वर्ष 2002 में बीटी कपास को मंजूरी मिलने से पहले देश में कपास का उत्पादन लंबे समय तक 1.5-1.7 करोड़ गांठ के आसपास ठहरा हुआ था और उत्पादकता 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम थी। वर्ष 2013-14 तक कपास का उत्पादन करीब 4 करोड़ गांठ पहुंच गया। उत्पादकता में भी लगभग दोगुनी वृद्धि हुई और भारत दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक तथा प्रमुख निर्यातक देशों में शामिल हुआ।

महाराष्ट्र के अकोला के प्रगतिशील किसान गणेश नानोटे (लंबे समय से जीएम कपास की खेती कर रहे हैं) ने कहा, “बीटी कपास आने से पहले हर साल गुलाबी सुंडी और अन्य कीट हमारी फसल को नुकसान पहुंचाते थे और कीटनाशकों पर काफी खर्च होता था। इस तकनीक ने खेती का तरीका बदल दिया। उपज बढ़ी, छिड़काव कम हुआ और किसान परिवारों को बच्चों की शिक्षा तथा खेत में निवेश करने का अवसर मिला। किसान विज्ञान से नहीं डरते। हम सिर्फ विकल्प चाहते हैं।”

एनइएफआई ने जीएम सरसों के डीएमएच- 11 हाइब्रिड का भी उल्लेख किया, जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय में सार्वजनिक धन से विकसित किया गया है। संगठन के अनुसार, परीक्षणों में डीएमएच 11 ने राष्ट्रीय मानक किस्म की तुलना में करीब 28 प्रतिशत अधिक उपज दर्ज की थी। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने वर्ष 2022 में इसके पर्यावरणीय रिलीज को मंजूरी दी थी। हालांकि, जुलाई 2024 में उच्चतम न्यायालय के विभाजित फैसले के बाद इस पर आगे की प्रक्रिया अटक गई है। दूसरी ओर, भारत जीएम सोयाबीन और कैनोला से बने तेल का आयात जारी रखता है।

संगठन ने कहा कि वर्ष 2025-26 में देश का तिलहन उत्पादन 4.306 करोड़ टन रहा, जबकि नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स के तहत 2030-31 तक 6.97 करोड़ टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मौजूदा उत्पादन वृद्धि दर से करीब तीन गुना तेज गति से आगे बढ़ना होगा।

किशोर जायसवाल ने कहा कि बीटी कपास ने दिखाया है कि सही तकनीक और सही साधन मिलने पर भारतीय किसान क्या हासिल कर सकते हैं। सरसों अगली ऐसी सफलता की कहानी बन सकती है। हमारी मांग है कि जीएम फसलों को लेकर विज्ञान आधारित और समयबद्ध निर्णय लिए जाएं, ताकि उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए हर बार विदेशों पर निर्भर न रहना पड़े।

-------------

हिन्दुस्थान समाचार / रामानुज शर्मा

Powered By Sangraha 9.0