
शिमला, 05 सितंबर (हि.स.)। पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने कहा कि तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बत के निवासियों ने विश्व इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। उन्होंने कहा कि तिब्बत के पास आज अपना कोई स्वतंत्र देश नहीं है और वहां की संस्कृति, पहचान तथा अस्तित्व को समाप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बावजूद तिब्बत राष्ट्र ने विश्व इतिहास में अपना अस्तित्व और सम्मान बनाए रखा है।
शांता कुमार ने शनिवार काे एक बयान में कहा कि तिब्बत की अपनी सरकार, संसद, प्रधानमंत्री और मंत्री हैं। संसद के विधिवत चुनाव होते हैं तथा विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले तिब्बती नागरिक इन चुनावों में मतदान करते हैं। संसद के नियमित अधिवेशन आयोजित होते हैं और निर्वासित तिब्बत सरकार लोकतांत्रिक ढंग से अपना कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि तिब्बत का अपना स्वतंत्र देश भले ही नहीं है, लेकिन तिब्बत का प्रश्न आज भी पूरे विश्व में प्रमुखता से चर्चा का विषय बना हुआ है। साथ ही तिब्बत की संस्कृति, परंपराएं और रीति-रिवाज भी सुरक्षित हैं।
उन्होंने कहा कि विश्व इतिहास में यह अपने प्रकार की अनूठी घटना है कि किसी राष्ट्र का अपना देश छिन जाने के बावजूद उसकी राष्ट्रीय पहचान, सरकार और संसद जीवित हैं तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से काम कर रही हैं।
शांता कुमार ने कहा कि तिब्बत लंबे समय तक शांतिपूर्ण जीवन जीने वाला देश रहा है। महात्मा बुद्ध का जन्म भारत में हुआ, लेकिन बौद्ध धर्म के गहन दर्शन और आध्यात्मिक परंपराओं का व्यापक विकास तिब्बत में हुआ। उन्होंने कहा कि छोटा सा तिब्बत शांति से अपना जीवन व्यतीत कर रहा था और उसने कभी किसी देश की ओर आक्रामक दृष्टि से नहीं देखा।
उन्होंने चीन द्वारा तिब्बत पर किए गए कब्जे और वहां की पहचान को समाप्त करने के प्रयासों को इस सदी की बड़ी त्रासदी और महापाप करार दिया। उन्होंने कहा कि तमाम कठिन परिस्थितियों के बावजूद तिब्बत ने विश्व इतिहास में अपना अलग स्थान बनाए रखा है और सम्मान के साथ अपनी पहचान कायम रखी है।
शांता कुमार ने कहा कि तिब्बत की इस उपलब्धि का सबसे बड़ा श्रेय तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को जाता है। उनके नेतृत्व, संघर्ष और शांतिपूर्ण प्रयासों ने तिब्बत के प्रश्न को पूरी दुनिया के सामने जीवित रखा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील शुक्ला